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भरतपुर । आज हम जो कुछ हैं, वह हमारी परवरिश के कारण हैं। बच्चे के लिए उसके माता-पिता सबसे पहले आदर्श होते हैं। उनके व्यवहार व आचरण का बच्चे के कोमल मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे व्यक्ति जो समाज में अनुकरणीय माने जाते हैं, उनका बचपन किसी ना किसी रूप में विलक्षण था जिसमें उनके माता-पिता की परवरिश का बहुत बड़ा योगदान था। बच्चों की परवरिश ऐसी होनी चाहिए जिससे बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से सबल बन सकें, उनको ऐसे संस्कार दे सकें जिससे वे अपने जीवन को साहस और उमंग से जी सकें तथा आने वाली चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें। उक्त वाक्य डा. डिम्पल डागुर ने जयपुर टाईम्स से खास मुलाकात में कहें। डा. डागुर ने बताया कि संयुक्त परिवारों की घटती संख्या, तकनीक का अंधाधुंध उपयोग व भागमभाग वाली जीवन शैली आदि कारणों की वजह से आज के समय में बच्चों की परवरिश एक चुनौती बन गयी है। माता-पिता बच्चों को जीवन मूल्य सिखाने के बजाय उनको सुख-सुविधा देना चाहते हैं, इसी में वे अपनी कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैंप् बच्चे क्या चाहते हैं। उनकी योग्यता कितनी है। इन पहलुओं पर ध्यान देने के बजाय माता-पिता अपने मत और इच्छा बच्चों पर थोप देते हैंप् इसी क्रम में स्वयं माता-पिता का आचरण जो कि वे बच्चों से चाहते हैं, भिन्न हो जाता है जिससे बच्चे की मनोदशा भ्रामक हो जाती है, उसको स्पष्ट मार्गदर्शन अनुभव नहीं होता है। इस असमंजस की स्थिति में उनकी मानसिक ऊर्जा खर्च हो जाती है। कम उम्र में डिप्रेशन, तनाव, चिंता, नशीले पदार्थों का सेवन, मोबाइल एडिक्शन, आदि मानसिक परेशानियाँ इस युग में बढ़ती जा रही हैं। इसका अर्थ यह है कि बच्चों ने चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करना सही ढंग से नहीं सीखा है और वे इतने हताश और कुंठित हो जाते हैं कि आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। क्या कहीं आप भी अपने बच्चों की परवरिश इसी तरह से तो नहीं कर रहे हैं। बच्चों से परस्पर संवाद करते समय आपकी प्रतिक्रियाएं बिना सोचे समझे होती हैं या सूझ-बूझ भरी होती हैं। ये सब प्रतिक्रियायें बाल मन पर गहरा प्रभाव छोडती हैं एवं एक विशिष्ट वातावरण प्रदान करती हैंप् मनोविज्ञान में स्वयं की प्रतिक्रिया का ज्ञान और उपयोग माइंडफुलनेस नामक तकनीक के रूप में जाना जाता है जिससे हमारे सामाजिक सम्बन्ध सोहाद्र्रपूर्ण व अर्थपरक बन जाते हैंप् इस तकनीक में स्वयं की प्रतिक्रिया को जाना जाता है और परिस्थिति के अनुसार प्रतिक्रिया दी जाती है। इस तकनीक के प्रयोग से माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण या परवरिश स्वस्थ तरीके से कर सकते हैंप् इस क्रम जब भी बच्चों से संवाद होता है तो प्रतिक्रिया बिना सोचे समझे नहीं होनी चाहिए अपितु बच्चों के उचित पालन-पोषण के लिए जो प्रतिक्रियाएं जरूरी हैं उनको दिया जाये जैसे बच्चों को मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाया जाये जिससे उनके जीवन में कोई भी उतार-चढ़ाव आये तो वे संभल सके और दूसरे लोगों को भी संभाल सकें। परवरिश में दो पहलू बहुत महत्वपूर्ण हैं। जुड़ाव पहला पहलू है जिसमें बच्चा माता-पिता के साथ कैसा महसूस करता है-जैसे बच्चा माता-पिता के साथ रहने पर इतना आश्वस्त हो जाता है कि वह अपनी हर बात उनके साथ साझा कर लेता है, अपने हर भाव को अभिव्यक्त कर लेता हैय उसका उनके लिए कितना महत्व है अर्थात माता-पिता बच्चों से क्या चाहते हैं और इसको वे किस तरह से व्यक्त करते हैं जैसे उसकी पढाई, उसका कक्षा में स्थान, या उसकी उमंग और आन्तरिक प्रसन्नताप् पालन-पोषण के सम्बन्ध में माता-पिता का बच्चों के साथ जुड़ाव निम्न प्रकार से अच्छा हो सकता है- 1. प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति- जब भी बच्चे से मिलें तब ऐसी अभिव्यक्ति दें जैसे कि आपको दुनिया-जहाँ की खुशियाँ मिल गयी हैं जिससे बच्चे को एक सुरक्षा एवं स्नेह के वातावरण का एहसास हो। 2. श्रवण- बच्चे की हर बात को ध्यान और गंभीरता से सुना जाये। 3. स्पर्श- इसमें विभिन्न शारीरिक स्पर्श आते हैं जैसे उनको गले लगाना, लाड़ करना आदि। 4. प्रशंसा- उनके प्रत्येक अच्छे व्यवहार को अविलम्ब प्रशंसा दें। 5. उपेक्षा- बच्चों के वह व्यवहार जो उनके पालन-पोषण की दृष्टि से सही नहीं हैं, उनको तवज्जो न दें। जब आप बच्चे के साथ एक जुड़ाव विकसित कर लेते हैं, तब आप बच्चे को समझ पाते हैं, उनकी क्या-क्या कमियाँ हैं जिनको दूर किया जा सकता है और उसके लिए क्या-क्या कदम उठाये जा सकते हैं, उनका ज्ञान होने लगता हैप् इसी प्रकार बच्चे में कौन-कौन से क्षमताएँ हैं जिनको उभार कर मजबूत बनाया जा सकता है, का भान हो जाता है। परवरिश का दूसरा पहलू है सकारात्मक पक्षों पर ध्यान। इसके अंतर्गत बच्चों के उन पहलुओं पर ध्यान दें जो सकारात्मक हैं और जिन्हें हम बढ़ाना चाहते हैंप् जिस प्रकार हम मिट्टी में बहुत सारे बीज डालते हैं लेकिन जिन बीजों को खाद और पानी मिलता है, वही बीज बड़े होकर वृक्ष बनते हैंप् इसी प्रकार बच्चे के जिस व्यवहार पर हमारा ध्यान ज्यादा रहेगा, वाही व्यवहार बच्चे के अंदर विकसित होगाप् अत: उसके सकारात्मक पक्षों पर ध्यान दें, न कि नकारात्मक पर।

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