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लखनऊ। भादो में आज पूर्णिमा तिथि के साथ ही श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ हो जाएगा। सोलह दिन के लिए हमारे पितृ घर में विराजमान होंगे। इस दौरान अपने वंश का कल्याण करेंगे।

घर में सुख-शांति-समृद्धि प्रदान करेंगे। जिनकी कुंडली में पितृ दोष हो, उनको अवश्य अर्पण-तर्पण करना चाहिए। वैसे तो सभी के लिए अनिवार्य है कि वे श्राद्ध करें। श्राद्ध करने से हमारे पितृ तृप्त होते हैं। सोमवार को पूर्णिमा है। जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई है, वे सवेरे तर्पण करें और मध्याह्न को भोजनांश निकालकर अपने पितरों को याद करें। 

पूर्णिमा का श्राद्ध

सोमवार को प्रात: 7.17 बजे से पूर्णिमा का प्रारम्भ हो जाएगा। इसके बाद आप पूर्णिमा का श्राद्ध कर सकते हैं। अश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष को समर्पित है। इन 16 दिन में हमारे पूर्वज हमारे घरों पर आते हैं और तर्पण मात्र से ही तृप्त होते हैं। श्राद्ध पक्ष का प्रारम्भ भाद्रपद मास की पूर्णिमा से होता है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष के समय सूर्य कन्या राशि में स्थित होता है। सूर्य के कन्यागत होने से ही इन 16 दिनों को कनागत कहते हैं। पितरों के प्रति तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन ही श्राद्ध कहलाता है। देव, ऋर्षि और पितृ ऋण के निवारण के लिए श्राद्ध कर्म है। अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख-शांति की कामना ही वस्तुत: श्राद्ध कर्म है। 

कुतुप मुहूर्त-11:48 से 12:36 तक

रोहिण मुहूर्त- 12:36 से 13:24 तक

अपराह्न काल-13:24 से 15:48 तक

 

जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो

 

पूर्णिमा तिथि 24 सितंबर को 7.17 से प्रारम्भ होकर 25 सितंबर को 8.22 पर समाप्त होगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार श्राद्ध में उदय तिथि का महत्व नहीं होता अपितु तिथि की उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। जिस दिन मृत्यु हुई हो, उस तिथि का महत्व है। तिथि पर सवेरे तर्पण और दोपहर को भोजन कराया जाना चाहिए।

कैसे करें श्राद्ध

 

पहले यम के प्रतीक कौआ, कुत्ते और गाय का अंश निकालें। इसमें भोजन की समस्त सामग्री में से कुछ अंश डालें।फिर किसी पात्र में दूध, जल, तिल और पुष्प लें। कुश और काले तिलों के साथ तीन बार तर्पण करें। ऊं पितृदेवताभ्यो नम:पढ़ते रहें।बाएं हाथ में जल का पात्र लें और दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की तरफ करते हुए उस पर जल डालते हुए तर्पण करते रहें।वस्त्रादि जो भी आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं।

यदि ये सब न कर सकें तो

 

दूरदराज में रहने वाले, सामग्री उपलब्ध नहीं होने, तर्पण की व्यवस्था नहीं हो पाने पर एक सरल उपाय के माध्यम से पितरों को तृप्त किया जा सकता है। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके खड़े हो जाइए। अपने दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की ओर करिए। 11 बार पढ़ें..ऊं पितृदेवताभ्यो नम:। ऊं मातृ देवताभ्यो नम: ।

 

क्या न करें

तेल और साबुन का प्रयोग न करें ( जिस दिन श्राद्ध हो)।शेविंग न करें

जहां तक संभव हो, नए वस्त्र न पहनें, तामसिक भोजन न करें। तामसिक होने के कारण ही इनको निषिद्ध किया गया है।

पितरों की शांति के लिए यह भी करें

एक माला प्रतिदिन ऊं पितृ देवताभ्यो नम: की करें।

ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम:का जाप करते रहें।

भगवद्गीता या भागवत का पाठ भी कर सकते हैं।

 

यह भी ध्यान रखें

पुरुष का श्राद्ध पुरुष को, महिला का श्राद्ध महिला को दिया जाना चाहिए। यदि पंडित उपलब्ध नहीं हैं तो श्राद्ध भोजन मंदिर में या गरीब लोगों को दे सकते हैं। यदि कोई विषम परिस्थिति न हो तो श्राद्ध को नहीं छोडऩा चाहिए। हमारे पितृ अपनी मृत्यु तिथि को श्राद्ध की अपेक्षा करते हैं। यथा संभव उस तिथि को श्राद्ध कर देना चाहिए। यदि तिथि याद न हो और किन्हीं कारणों से नहीं कर सकें तो पितृ अमावस्या को अवश्य श्राद्ध कर देना चाहिए।

पितृ दोष प्रबल हो तो यह भी करें उपाय

यदि कुंडली में प्रबल पितृ दोष हो तो पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए। तर्पण मात्र से ही हमारे पितृ प्रसन्न होते हैं। वे हमारे घरों में आते हैं और हमको आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो इन सोलह दिनों में तीन बार एक उपाय करिए। सोलह बताशे लीजिए। उन पर दही रखिए और पीपल के वृक्ष पर रख आइये। इससे पितृ दोष में राहत मिलेगी। यह उपाय पितृ पक्ष में तीन बार करना है।

 

श्राद्ध की तिथियां

 

24 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध

 

25 सितंबर - प्रतिपदा श्राद्ध

 

26 सितंबर - द्वितीय श्राद्ध

 

27 सितंबर - तृतीय श्राद्ध

 

28 सितंबर - चतुर्थी श्राद्ध

 

29 सितंबर - पंचमी श्राद्ध

 

30 सितंबर - षष्ठी श्राद्ध

 

1 अक्टूबर - सप्तमी श्राद्ध

 

2 अक्टूबर - अष्टमी श्राद्ध

 

3 अक्टूबर - नवमी श्राद्ध

 

4 अक्टूबर - दशमी श्राद्ध

 

5 अक्टूबर - एकादशी श्राद्ध

 

6 अक्टूबर - द्वादशी श्राद्ध

 

7 अक्टूबर -त्रयोदशी श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध

 

8 अक्टूबर - सर्वपितृ अमावस्या।

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