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वाराणसी। सनातनी परंपरा के तीन ऋणों में पितृ ऋण प्रमुख माना जाता है। पितरों को समर्पित आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष कहा जाता है। इस बार आश्विन मास की शुरुआत 26 सितंबर से होगी मगर सनातन धर्म में किसी पक्ष की शुरुआत उदया तिथि के अनुसार मानी जाती है और श्राद्ध-तर्पण का समय मध्याह्न में होना आवश्यक माना जाता है।

इस लिहाज से पितृपक्ष का आरंभ 25 सितंबर से हो रहा है। खास यह है कि इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष में षष्ठी तिथि की हानि से यह पक्ष 14 ही दिनों का होगा। ऐसे में द्वादशी और त्रयोदशी का श्राद्ध तर्पण छह अक्टूबर को किया जाएगा। सर्वपैत्री श्राद्ध अमावस्या व पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को मनाया जाएगा।

शास्त्रीय मान्यता

जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख, सौभाग्य आदि की अभिवृद्धि के लिए अनेक प्रयत्न व प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म ग्रहण करना निरर्थक है। उनके ऋण उतारने में कोई ज्यादा खर्च भी नहीं होता। केवल वर्ष भर में उनकी मृत्यु तिथि को सर्व सुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करने के साथ ही गो ग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्माणों को भोजन करा देने मात्र से ऋण उतर जाता है।

यह है विधान

ज्योतिषाचार्य ऋषि द्विवेदी के अनुसार, पितृ पक्ष में नदी तट पर विधिवत तर्पण तथा मृत्यु तिथि पर अपने पूर्वजों के श्राद्ध में ब्राह्माणों को भोजन श्रद्धा के साथ करवाकर पितरों को तृप्त व प्रसन्न किया जाता है। मृत्यु तिथि पर अपने पितरों को याद कर उनकी स्मृति में योग्य ब्राह्माण को श्रद्धा पूर्वक इच्छा भोजन करा के दान-दक्षिणा देते हुए संतुष्ट करना चाहिए। पितृ विसर्जन के दिन रात्रि में मुख्य द्वार पर दीपक जलाकर पितृ विसर्जन किया जाता है। यदि उन्हें यह उपलब्ध नहीं होता है, तो वे श्राप दे कर चले जाते हैं।

तिथि विशेष

प्रतिपदा का श्राद्ध 25 सितंबर, द्वितीया का श्राद्ध 26 सितंबर, तृतीया का श्राद्ध 27 सितंबर, चतुर्थी का श्राद्ध 28 सितंबर, पंचमी का श्राद्ध 29 सितंबर, षष्ठी का श्राद्ध 30 सितंबर, सप्तमी का श्राद्ध, एक अक्टूबर, अष्टमी का श्राद्ध दो अक्टूबर, नवमी का श्राद्ध तीन अक्टूबर, दशमी का श्राद्ध चार अक्टूबर, एकादशी का श्राद्ध पांच अक्टूबर, द्वादशी व त्रयोदशी का श्राद्ध छह अक्टूबर, चतुर्दशी का श्राद्ध सात अक्टूबर और पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को किया जाएगा।

 

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