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शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र एक एेसा महामंत्र है जिसकी मान्यता ॐ के समान मानी जाती है। यह मंत्र सफलता प्रदान करने वाला माना गया है। इस मंत्र की उपासना से जो फल प्राप्त होता है, उसका शब्दों में वर्णन करना सम्भव नहीं है। गायत्री मंत्र 24 अक्षरों का होता है, इसलिए इसे 24 वर्णीय मंत्र कहा जाता हैं। वेदों व शास्त्रों में कहा गया है कि गायत्री मंत्र का जाप करने से व्यक्ति के जीवन की हर समस्या का अंत हो जाता है। 


गायत्री मंत्र
'ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्' 


वेदों में गायत्री मंत्र के जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। इसके अनुसार सूर्योदय से थोड़ी देर पूर्व मंत्र का जाप शुरू कर देना चाहिए। फिर दोपहर में भी गायत्री मंत्र का जाप किया जा सकता है। 


तीसरा समय शाम सूर्यास्त के कुछ देर पूर्व मंत्र जाप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप किया जा सकता है। 


किसी आकस्मिक काम के कारण जाप में बाधा आने पर हाथ-पैर धोकर फिर से जाप करें। इन तीनों समय के अतिरिक्त मौन रहकर या मानसिक रूप से भी जाप कर सकते हैं क्योंकि गायत्री मंत्र का जाप तेज आवाज में नहीं किया जाता।


इस मंत्र के नियमित जप से त्वचा में चमक आती है। आंखों की रोशनी बढ़ती है। सिद्धि प्राप्त होती है। गुस्सा शांत होता है। ज्ञान की वृद्धि होती है। कामों में आ रही रुकावटें दूर होने लगती है और कामयाबी मिलने लगती है।

इस मंत्र के निरंतर जाप से व्यापार तथा नौकरी में हो रहे नुकसान से छुटकारा मिलता है। 


यह मंत्र चौबीस अक्षर का है इसलिए इसे चौबीस शक्तियों-सिद्धियों का प्रतीक माना गया है। जिस कारण शास्त्रों में इसे सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला बताया है।


छात्रों के लिए यह मंत्र बहुत ही फलदायी माना गया है। यदि किसी विद्यार्थी का मन पढ़ाई आदि में न लगता हो तो उसे 108 बार इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे विद्यार्थी के मन में एकाग्रता पैदा होने लगती है। 


स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है, इसलिए उसे मंत्रों का मुकुटमणि कहा गया है।

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