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ते बजट का विश्लेषण बताता है कि वर्ष 2018-19 में बजट अनुमानों के राजस्व की तुलना में वास्तविक राजस्व प्राप्तियों में 1.70 लाख करोड़ रुपये की कमी रही। यह कमी बजट अनुमानों के 11 प्रतिशत के बराबर थी। केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष करों की प्राप्ति का लक्ष्य 13.35 लाख करोड़ रुपये था, जबकि नवंबर तक इसकी प्राप्तियां छह लाख करोड़ रुपये ही थी और सरकार की संबंधित एजेंसी की ओर से यह संकेत दिया गया कि प्रत्यक्ष करों की प्राप्तियां काफी कम रह सकती हैं। मात्र कॉरपोरेट करों की दर में कमी के चलते 1.45 लाख करोड़ रुपये का राजस्व का नुकसान हो सकता है। उधर जीएसटी की प्राप्तियां भी बहुत प्रोत्साहन देने वाली नहीं है। सरकार के बजट में कुल खर्च और उधार को छोड़ सभी प्राप्तियों के अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इस राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है। यह उधार आम जनता से लिया जाना होता है, लेकिन इसमें एक बड़ा हिस्सा बैंकों और वित्तीय संस्थानों का भी होता है। इसके अलावा सरकार रिजर्व बैंक के माध्यम से अतिरिक्त नोट छापकर भी घाटे को पूरा करती है। इस प्रक्रिया को घाटे का मौद्रिकीकरण कहते हैं। अधिक राजकोषीय घाटे का मतलब है अधिक मुद्रास्फीति। ज्यादा राजकोषीय घाटा होने पर मौद्रिकृत घाटा भी बढ जाता है और इस कारण करेंसी का सर्कुलेशन बढ जाता है, जिससे मुद्रास्फीति यानी कीमतों में वृद्धि होती है। यूपीए सरकार के समय वर्ष 2011-12 तक आते-आते राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.7 प्रतिशत तक पहुंच गया था। नतीजन यूपीए के कार्यकाल में मुद्रास्फीति दो अंकों (13 प्रतिशत) तक पहुंच गई।   नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के बाद आर्थिक नीति में स्पष्टता लाते हुए सबसे पहला फैसला यह किया गया कि राजकोषीय घाटा एक सीमा में रखा जाए। यूपीए सरकार के अंतिम बजट और यूं कहें कि 2014-15 के अंतरिम बजट में तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने राजकोषीय घाटे का अनुमान जीडीपी का 4.1 प्रतिशत रखा और उससे पिछले साल यानी 2013-14 का राजकोषीय घाटा कम करके दिखाया गया था। हालांकि उस समय के आर्थिक विश्लेषकों का यह मानना था कि वह राजकोषीय घाटा वास्तविक नहीं था और वास्तव में घाटा उससे कहीं ज्यादा था। यह काम आंकड़ों की हेराफेरी और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों से अग्रिम डिविडेंट लेकर किया गया था। ऐसे में एनडीए सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने एक चुनौती थी कि इस प्रकार की वित्तीय फेरबदल के मद्देनजर राजकोषीय घाटे को कैसे सीमित रखा जा सकता है। अरुण जेटली ने उस चुनौती को स्वीकार किया और 2014- 15 के पूर्ण बजट (जो जुलाई 2014 में प्रस्तुत किया गया था) उसमें उस वर्ष के राजकोषीय घाटे को चिदंबरम के अंतरिम बजट के अनुरूप जीडीपी के 4.1 प्रतिशत पर ही रखा। उसके उपरांत एनडीए सरकार ने राजकोषीय घाटे को निरंतर घटाते हुए वर्ष 2015-16, 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में इसे क्रमश: जीडीपी के 3.9, 3.5, 3.2 और 3.3 प्रतिशत पर रखा। घाटे पर लगाम लगाने का असर यह हुआ कि कीमतें नियंत्रण में आने लगीं और मोदी सरकार के कार्यकाल में उपभोक्ता कीमतों में वृद्धि 2018-19 में मात्र 3.4 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत था, क्योंकि इसके कारण ब्याज दरों के घटने का रास्ता साफ हो गया था। नीतिगत ब्याज दर का सीधा संबंध मुद्रास्फीति के साथ होता है। जब मुद्रास्फीति कम होती है तो रिजर्व बैक ब्याज दरों को घटाता है। ब्याज दर घटने से एक ओर निवेश लागत कम हो जाती है, जिससे निवेश बढता है। दूसरी तरफ घरों, कारों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के लिए उधार सस्ता हो जाता है और ईएमआइ घट जाती है। इससे भी अर्थव्यवस्था में मांग बढती है। महंगाई घटने से लोगों का जीवन बेहतर होता है। यानी मोदी सरकार के पहले चरण में एक ओर कीमतें नियंत्रण में रहीं, दूसरी तरफ जीडीपी ग्रोथ भी बेहतर हो गई थी। जैसाकि अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2019-20 का राजकोषीय घाटा जो मात्र 3.4 प्रतिशत अनुमानित था, वह 4.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि इससे महंगाई भी बढ सकती है। उधर देश मांग में धीमेपन के चलते लगातार ग्रोथ के घटते अनुमानों से जूझ रहा है। वर्ष के प्रारंभ में सात प्रतिशत के आसपास संभावित ग्रोथ का आकलन किया जा रहा था, जो घटकर पांच प्रतिशत पर आ गया है। ऐसे में बढते राजकोषीय घाटे के चलते नीतिगत ब्याज दर में कमी की संभावनाएं घटती जा रही हैं, जिसके चलते निवेश और उपभोक्ता मांग में वृद्धि की उम्मीद भी कम हो जाएगी। ऐसे में वर्ष 2020-21 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने एक चुनौती होगी कि राजकोष को किस तरह से संतुलन में रखा जाए और कम से कम अगले साल राजकोषीय घाटा सीमा में रहे। स्पष्ट है कि धीमेपन के चलते प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों की प्राप्ति उम्मीद से कम है और साथ ही निवेश को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से कॉरपोरेट टैक्स की दर घटाने के कारण भी राजस्व कम हो जाएगा। उधर जीएसटी वसूली भी उम्मीद से कम हो रही है, जिसका दोहरा नुकसान केंद्र सरकार को 
हो रहा है। 


एक ओर उसका स्वयं का राजस्व कम हो रहा है, दूसरी ओर उसे राज्यों को कम प्राप्ति का भी मुआवजा देना प? रहा है। गौरतलब है 2019-20 में उसे पहले से कहीं ज्यादा राज्यों को भरपाई करनी होगी। इनवेस्टमेंट इंफोर्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आइसीआरए) के अनुसार नौ ब?े राज्यों के लिए ही भरपाई की राशि पिछले वर्ष की तुलना में दोगुनी होकर 70 हजार करो? रुपये तक पहुंच सकती है। अन्य राज्यों के राजस्व की भरपाई के लिए राशि को मिला लिया जाए तो केंद्र सरकार के लिए स्थिति और विकट हो सकती है। आज जबकि कॉरपोरेट का व्यवसाय ब? रहा है, लेकिन कॉरपोरेट टैक्स की प्राप्तियां नहीं ब? पा रही हैं? इसका कारण यह है कि तकनीकी कंपनियां, ई-कामर्स कंपनियां और ब?ी विदेशी सॉफ्टवेयर कंपनियां टैक्स नहीं देती हैं। यह सर्वविदित है कि देश का खुदरा व्यापार लगातार ब?ी विदेशी ई-कामर्स कंपनियों के हाथ में जाता जा रहा है। इसी प्रकार ट्रैवल, टैक्सी आदि सेवाओं के क्षेत्र में भी ब?े कॉरपोरेट एग्रीगेटर आ गए हैं। वास्तव में ये कंपनियां अपनी आर्थिक ताकत के बल पर डिस्काउंट देते हुए बाजार और डाटा पर कब्जा कर रही हैं। इस प्रकार उनका मूल्यन लगातार ब? रहा है। यानी प्रोमोटरों को तो खासा लाभ हो रहा है, लेकिन ये कंपनियां आयकर देने से बच रही हैं। विशेषज्ञों की ओर से लगातार यह सुझाव दिया जा रहा है कि ऐसी कंपनियों पर उनके व्यवसाय की मात्रा के आधार पर न्यूनतम टैक्स दर लगाकर उनसे आयकर वसूला जाए। हमें समझना होगा कि पिछले लंबे समय से सरकारी खजाने को इस कारण नुकसान हो रहा है। ऐसी चिंता भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में जताई जा रही है। 'ओईसीडीÓ देशों में इसके बारे में प्रयास शुरू हो चुके हैं और फ्रांस ने इस बाबत पहल की है। भारत को भी इसके बारे में विचार करना होगा, तभी सरकारी राजस्व में आ रही कमी की भरपाई हो पाएगी।  

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