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शनिवार दि॰ 10.03.18 चैत्र कृष्ण नवमी पर मूल नक्षत्र व सिद्धि योग है। आज महाविद्या देवी तारा का पूजन करना श्रेष्ठ है। आद्यशक्ति ने हयग्रीव के वध हेतु नीलवर्ण धारण किया था। देवी प्रकाश बिंदु रूप में आकाश के तारे की भांति स्थित हैं, इसी कारण इन्हें तारा कहते हैं। समुद्र मंथन के समय महादेव के हलाहल विष पीने पर, उनकी शारीरिक पीड़ा के निवारण हेतु, इन्हीं देवी तारा ने माता स्वरूप में महादेव को अमृतमय दुग्ध स्तनपान कराया था। जिससे महादेव को समस्त शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिली थी। देवी तारा अपने तीन स्वरूप से विख्यात हैं, उग्र तारा, नील सरस्वती व एक-जटा। त्रीनेत्री देवी उग्र तारा का स्वरूप अत्यंत ही भयानक हैं। दिगंबरा देवी बाघाम्बर पहन कर घोर महा-श्मशान में ज्वलंत चिता पर निवास करती हैं। देवी, नर खप्पर व हड्डियों की मालाओं से अलंकृत हैं व सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करती हैं। नील-सरस्वती स्वरूप में संपूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान फैला हुआ है उसे एकत्रित करने पर देवी तारा के रूप का निर्माण होता है। समस्त ज्ञान नील-सरस्वती का मूलरूप ही हैं। एकजटा स्वरूप में पिंगल जटा जुट वाली यह तारा सत्व गुण सम्पन्न हैं व अपने भक्त को मोक्ष प्रदान कर मोक्षदात्री बन जाती हैं। सर्वप्रथम ज्वलंत चिता में उग्र तारा प्रेत को जलाती हैं, द्वितीय नील सरस्वती, शव को शिव बनाती हैं। तीसरे एकजटा जीवित शिव को अपने पिंगल जटा में धारण कर मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी तारा के विशेष पूजन व उपाय से नेत्र विकारों से मुक्ति मिलती है, आर्थिक सफलता मिलती है व शिक्षा क्षेत्र में सफलता मिलती है।


विशेष पूजन: घर की दक्षिण दिशा में नीला वस्त्र बिछाकर देवी तारा का चित्र स्थापित पर उनका दशोपचार पूजन करें। सरसों के तेल का दीप करें, लोहबान की धूप करें, तेजपत्ता चढ़ाएं, सुरमा चढ़ाएं, लौंग, नारियल, काली मिर्च, बादाम चढ़ाएं व रेवड़ियों का भोग लगाकर 108 बार विशिष्ट मंत्र जपें। इसके बाद रेवड़ियां प्रसाद स्वरूप में किसी कुंवारी को बांट दें।

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