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नई दिल्ली

उगना, डूबना और फिर उग जाना। बढ़ना, घटना और फिर बढ़ने लगना। कुदरत के यही नियम हैं। रूप बदल जाता है। देखने और बनाने वाले हाथ बदल जाते हैं। पर जीवन चलता रहता है। आकाश जानता है कि उसका सूरज फिर लौट आएगा। तभी वह उसे विदा भी पूरी खूबसूरती से करता है।

कल लाखों लोगों ने नम आंखों के साथ गणपति को विदाई दी। उनका आना और जाना दोनों ही बेहद खूबसूरत होते हैं। बावजूद मन तो मन है। विदा की बेला भावुक कर ही देती है। और फिर जिस दुनिया में हम हैं, उसका नियम ही यही है। मिट्टी का घट, पानी में बह जाता है। जिसका श्रीगणेश होता है, उसकी इतिश्री भी होती ही है। एक बार चीज आकार लेती है, तो उससे अलग होने का काउंटडाउन भी शुरू हो जाता है।

 

पर हममें और कुदरत में एक अंतर है। हम पकड़ तो लेते हैं, पर उसी सहजता से छोड़ नहीं पाते। घर-ऑफिस के रिश्ते हों, पद -प्रतिष्ठा हो, वस्तुएं या विचार हों, अपने कदमों को पीछे करना मुश्किल ही होता है। यूं छोड़ने का मतलब ये भी नहीं कि किसी वस्तु या रिश्ते से हमारा लगाव ही न हो। हम मतलबी हो जाएं या फिर अलग होते ही अच्छे और बुरे अनुभव दोनों ही यादों से खट से हटा दें। पर इतना तो हो कि जिसे पकड़ रहे हैं, उसे पूरी खूबसूरती से पकड़ें। उनके साथ अपने समय को पूरे प्यार और भरोसे के साथ जिएं। और कुछअच्छा नहीं है तो भी पूरी शालीनता से छोड़ें। ताकि बाद में यादों के पिटारों में, काश ये, वो, अब, तब, कसक और अफसोस न हो।

लेखक व प्रेरक वक्ता रॉबर्ट शूलर कहते हैं, ‘हम पहले दुख व बुरे हालात से शालीनता से बाहर आएं और फिर नए तरीके से अपनी वापसी करें। शालीनता से छोड़ने का मतलब होता है कि समय पूरा होने या बदलने पर हम बीते पद और सुविधाओं में अटके न रहें। बुरे हालात में भी कड़वाहट के साथ अंत नहीं करें।'

शुक्रिया जरूर कहें
मेरी एक दीदी हैं। वह अपना कारोबार करती हैं। उनकी एक खासियत है। उन्हें अपनी किसी दुकान, कमरे या मशीन को बदलना हो या पुरानी कार को विदा करना हो, तो छोड़ने से पहले वह उनका शुक्रिया जरूर करती हैं। अब तक के उनके साथ के लिए आभार व्यक्त करती हैं। उनका मानना है कि हमें अपनी पुरानी वस्तुओं को साफ-सुथरे ढंग से छोड़ना चाहिए। ताकि जिन्हें बाद में वे मिले, वे भी उनके लिए अच्छा महसूस कर सकें। 

जापान में कहावत है कि अंतत: सब एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। जंगल में खड़े पेड़, दूसरे कमजोर पेड़ों की जड़ों को अपना पोषण देकर जिंदा रखते हैं। तब वे परवाह नहीं करते कि उनका अपना क्या होगा। और बीमार पेड़, जाने से पहले अपना पोषण दूसरे पेड़ों को दे देता है। कुल-मिलाकर एक रूप से मिली ऊर्जा को दूसरे रूप में ले जा पाना ही हमारी जीवन यात्रा को बनाए रखता है।

बीच की खूबसूरत दुनिया
सब कुछ हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन जिस पर गर्व किया जा सकता है, जो वाकई हमारे हाथ में है, वह है आने और जाने के बीच की दुनिया। पकड़ने और छोड़ने के बीच का समय। हम खूब इच्छाएं करें। आगे बढ़ने की हर कोशिश करें। उदास मन से नहीं, जो मिला है, उससे भरपूर जिएं। पर, छोड़ना भी सीख जाएं। जो अच्छा मिला है, उसे दूसरों को देना सीख जाएं। मजबूरी के दिनों में जिस भाव से किसी से लिया था, उसे उसी भाव से लौटा भी पाएं। जो कदम आगे बढ़ाए थे, उन्हें जरूरत पड़ने पर बिना मलाल वापस भी मोड़ सकें। केवल रोएं नहीं, जाने वालों के अच्छे कामों को आगे ले जाएं।

ताकि फिर कभी पानी के साथ मिलकर मिट्टी जब नया रूप ले तो वह पहले से भी सुंदर बन जाए। कहीं किसी मोड़ पर बिछड़ों से मिलना हो तो खूबसूरती से मिल सकें। बिना शिकायतों के साथ रह सकें। हंसी-ठहाकों के साथ अपनी नईयात्रा शुरू कर सकें।

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