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देवी दुर्गा हिंदुओं की प्रमुख देवी हैं जिन्हें देवी और शक्ति भी कहते हैं, इन्हें आदि शक्ति, प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकार रहित भी बताया गया है। वह अंधकार व अज्ञानता रूपी राक्षसों से रक्षा करने वाली तथा कल्याणकारी हैं। इसलिए व्यक्ति को इनकी पूजा सच्चे व शुद्ध ह्रदय से करनी चाहिए। बल्कि यदि इंसान  वास्तु में बताई कुछ बातों का ध्यान रखे तो पूजा में ध्यान केंद्रित भी होता है और पूजा का फल भी जल्दी प्राप्त होता है।


वास्तु के अनुसार माता 
वास्तुशास्त्र के अनुसार, ध्यान का क्षेत्र उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) को माना गया है। यह दिशा मानसिक स्पष्टता और प्रज्ञा यानी इंट्यूशन से जुड़ी है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके माता का ध्यान करने से हमारी प्रज्ञा जागृत होती है। इसलिए नवरात्र काल में माता की प्रतिमा या कलश की स्थापना इस ही दिशा में करनी चाहिएं।


माता की मूर्ति को लकड़ी के पाटे पर ही रखें। अगर चंदन की चौंकी हो, तो आैर भी अच्छा रहेगा। वास्तुशास्त्र में चंदन शुभ और सकारात्मक उर्जा का केंद्र माना गया है। इससे वास्तुदोषों का शमन होता है।


स्थापना करने का शुभ मुहूर्त और विधि
अखंड ज्योति को पूजन स्थल के आग्नेय कोण में रखा जाना चाहिए। इस दिशा में अखंड ज्योति रखने से घर के अंदर सुख-समृद्धि का वास होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।


शाम के समय पूजन स्थान पर इष्ट देव के सामने प्रकाश का उचित प्रबंध होना चाहिए। इसके लिए घी का दीया जलाना अत्यंत शुभ माना गया है।

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