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चाणक्य की ही तरह आचार्य शुक्राचार्य भी एक प्रसिद्ध नीतिकार थे। फ़र्क सिर्फ इतना है कि शुक्राचार्य को दैत्यों का गुरु माना जाता था। परंतु वह अपने समय के प्रचंड विद्वानों और समस्त धर्म ग्रंथों के ज्ञाता थे। उनके द्वारा कही गई बातें शुक्र नीति में दर्ज हैं जिनमें मनुष्य की हर समस्या का हल छुपा है।


तो आईए जानते हैं, इनके द्वारा बताई गई एेसी बातें जो यदि इंसान अपने पल्ले बांध ले, तो वह सभी परेशानियों से मुक्त हो जाता है। 

श्लोक
दीर्घदर्शी सदा च स्यात, चिरकारी भवेन्न हि। 
अर्थ
भविष्य की सोचें, लेकिन भविष्य पर न टालें। 


भावार्थ- मनुष्य को अपना प्रत्येक कार्य भविष्य को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। यानि उसे ध्यान रखना चाहिए कि आज वह जो भी कार्य कर रहा है, उसका भविष्य में क्या परिणाम होगा। साथ ही जो काम आज करना है, उसे आज ही करें। आलस्य करते हुए उसे अपने किसी भी काम को भविष्य पर न टालें।

श्लोक
यो हि मित्रमविज्ञाय यथातथ्येन मन्दधिः।
मित्रार्थो योजयत्येनं तस्य सोर्थोवसीदति।।

अर्थ
मित्र बनाते समय सावधानी रखें 


भावार्थ- बिना सोचे-समझे किसी से भी मित्रता कर लेना, कई बार हानिकारक हो सकता है, क्योंकि मित्र के गुण-अवगुण, उसकी अच्छी-बुरी आदतें हम पर समान रूप से असर डालती हैं। इसलिए बुरे विचारों वाले या बुरी आदतों वाले लोगों से मित्रता नहीं करनी चाहिए।

 

श्लोक
नात्यन्तं विश्वसेत् कच्चिद् विश्वस्तमपि सर्वदा। 
अर्थ
हद से ज्यादा किसी पर भरोसा न करें 


भावार्थ- शुक्र नीति के अनुसार किसी व्यक्ति पर विश्वास करना ठीक है लेकिन अंधविश्वास करना उचित नहीं होता। शुक्राचार्य ने यह स्पष्ट कहा है कि किसी भी व्यक्ति पर हद से ज्यादा विश्वास करना घातक हो सकता है। कई लोग ऊपर से आपके भरोसेमंद होने का दावा करते हैं लेकिन भीतर ही भीतर आपसे बैर भाव रख सकते हैं। 


श्लोक
अन्नं न निन्घात्।।
अर्थ
अन्न का अपमान कभी न करें
 

भावार्थ- अन्न प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का आधार होता है, इसलिए जो भी भोजन आपको प्रतिदिन के आहार में प्राप्त हो उसे परमात्मा का प्रसाद समझते हुए ग्रहण करें। शास्त्रों में वर्णित है कि अन्न का अपमान करने वाला मनुष्य नर्क में घोर पीड़ा भोगता है।

 

श्लोक
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्ति स चाश्रुते।
अर्थ
मनुष्य को सम्मान धर्म से प्राप्त होता है


भावार्थ- जो मनुष्य अपने धर्म में बताए अनुसार जीवनयापन करता है, उसे कभी पराजय का सामना नहीं करना पड़ता। धर्म ही मनुष्य को सम्मान दिलाता है। इसलिए कभी भी अपने धर्म का अपमान नहीं करना चाहिए। 

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