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रतीय संस्कृति उत्सवधर्मी संस्कृति है। कृषि और शिल्प प्रधान देश होने के कारण प्राय: हमारे सभी उत्सव फसलों और शक्ति, समृद्धि के साथ जुड़े होते हैं। वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर फसलें पककर अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए तत्पर हो उठती हैं। धरती शस्य श्यामला हो उठती है और इसके बाद शुरू होता है श्री और शक्ति की उपासना, असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक दशहरा यानी विजयोत्सव। फिर दीपावली का पावन पर्व आता है। शरद ऋतु की समाप्ति के बाद सरस्वती पूजन के साथ वसंत का उत्सव आरंभ हो जाता है। आकुल चित्त इस वसंत का अधिष्ठान बन जाता है। उत्सवों की यह शृंखला ही भारतीय संस्कृति का प्राण है। जीवंत संस्कृति का यह चक्र अनवरत घूमता रहता है, ताकि हम सत्य से विमुख न हों और इस प्रकार अपनी भीतरी शक्ति से विमुख न हों। यही शक्ति पूरे भारत की आंतरिक शक्ति है। आखिर इस शक्ति का स्वरूप क्या है? शक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए कतिपय बिंदुओं की ओर दृष्टिपात करना आवश्यक है। शक्ति उन्माद न बनने पाए और सत्य का साहस के साथ उद्घोष कर पाए, यही शक्ति का स्वधर्म है।
 जैसे हवा का स्वधर्म प्राणियों को प्राणवायु देना है, सूर्य का धर्म ऊर्जा, अग्नि का स्वधर्म दाहकता, जल का स्वधर्म शीतलता है। नि:संदेह अहिंसा सबसे बड़ा मानवीय आदर्श है, परंतु दूसरी तरफ हिंसा अथवा रक्तपात का प्रतिकार न करना मनुष्य के भीतर की करुणा-वृत्ति का दुरुपयोग है। किसी मानवता विरोधी प्राणी द्वारा की गई हिंसक घटना के बाद बेसहारा माता-पिता, विधवा स्त्री, अनाथ बच्चे, अपंग हो गए सिपाही और निरीह लोगों की पुकार को सुनकर भी शक्ति के चुप रहने को अहिंसा नहीं माना जा सकता। शक्ति का अपना स्वाधीन चिंतन होता है। बिना किसी की पक्षधरता के उसे संहार के लिए तैयार होना पड़ता है, संहार के लिए काली बनना पड़ता है और रक्तबीजों को समूल नष्ट करने के लिए कर में खप्पर एवं खड्ग धारण करना पड़ता है। यह शक्ति ही हमें स्वाधीन चिंतन करने की प्रेरणा देती है। हिंसा अथवा अहिंसा की पक्षधरता से पृथक यह निष्पक्ष निर्णय के हुंकार का ओज भरती है कि इस परिस्थिति विशेष में करुणा की उपयोगिता है या कटार की? इसलिए त्रिशक्तियों के अनेक हाथों में विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र होते हैं जिनसे वह राक्षसी वृत्तियों का संहार करती है और सत्य की स्थापना करती है। इस सत्य की स्थापना अहिंसा से भी हो सकती है और अहिंसा के मार्ग में बाधा आने पर हिंसा और आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश के द्वारा भी स्थापित की जाती है। इसलिए भारत में समय-समय पर हम शक्ति की आराधना, साधना करते हैं ताकि हम उचित निर्णय ले सकें। शक्ति को किसी का पक्षधर नहीं होना चाहिए। उसे सदैव स्वाधीन चिंतन के पक्ष में खड़ा रहना चाहिए। मनुष्य के भीतर पक्षधरता तभी आती है जब वह दूसरों के चिंतन से प्रभावित होता है। प्रभु श्रीराम भी युद्ध से पूर्व शक्ति अर्जन और विजय की कामना से शक्ति की आराधना करते थे। शक्ति स्त्री रूपा है। भिन्न दर्शन के प्रतिपादकों ने किसी न किसी रूप में शक्ति तत्व को स्वीकार किया है। सांख्य के प्रकृति पुरुष में प्रकृति उसी शक्ति का प्रतीक है। वही लक्ष्मी, गौरी, सरस्वती का रूप धारण करती है। दुर्गा, काली, शिवा, धात्री आदि अनेक नामों से हम अखिल ब्रह्मांड में मातृ तत्व के रूप में व्याप्त इसी एक मात्र शक्ति का आह्वान करते हैं। मां की तरह कोई शक्ति निरंतर हमारा सृजन और पालन कर रही है। हम सब उसकी संतान हैं, परंतु जब कभी अहंकार में उस मां की ऊर्जा को नकारने का प्रयास करते हैं, उसकी सृष्टि को बाधा पहुंचाते हैं तो वह चंडी का रूप धारण कर हमें रोकती है। जब उसकी अवहेलना कर मानव अपनी शक्ति का प्रयोग नकारात्मक ढंग से हिंसा के लिए करने लगता है तभी वह नकारात्मक शक्तियों से घिरकर अशांत होता है। शक्ति का सकारात्मक उपयोग इसीलिए अपेक्षित होता है। इसी साधना के लिए महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा है कि संपूर्ण मानवता की विजय के लिए शक्ति का समन्वित रूप अपेक्षित है। शक्ति मानवता के पक्ष में खड़ी होती है। इस शक्ति को नकारने से शिव भी शव हो सकते हैं। श्री और शक्ति के बिना सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसीलिए नवरात्र के रूप में शक्ति जागरण का महापर्व बार-बार आता है। अपने स्वाधीन चिंतन और निष्पक्ष निर्णय का अश्रुत स्वर बार-बार प्रसारित करता है। सुन सकें तो सुनें, हम मानव संतानें।

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