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जयपुर टाइम्स
लखनऊ (एजेंसी)।
नामचीन स्कूल ब्राइटलैंड में क्लास फस्र्ट के 7 साल का बच्चा घायल हालत में मिला। बच्चे पर धारदार हथियार से वार के बाद स्कूल के बाथरूम में बंद कर दिया गया था। बाथरूम बच्चे की क्लास से 200 मीटर दूर है। घटना का पता तब चला, जब प्रेयर के लिए डिस्पलिन हेड बच्चों को कॉल करने पहुंचे। बाथरूम के पास से गुजरते वक्त दरवाजा पीटने की आवाज आई। स्कूल के डिसिप्लिन हेड अमित सिंह ने बताया, दरवाजा खोलने पर बच्चा खून से लथपथ मिला। उसके मुंह में लाल रंग का कपड़ा ठूंसा गया था। बच्चे को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में भर्ती कराया गया। पुलिस ने बच्चे की फैमिली से मुलाकात की है और जांच शुरू कर दी है। त्रिवेणी नगर रहने राजेश सिंह हाईकोर्ट में जॉब करते हैं, उनका बेटा ऋतिक ब्राइटलैंड स्कूल में फस्र्ट क्लास का स्टूडेंट है। राजेश का आरोप है, इस वारदात के बावजूद स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन ने पुलिस को इन्फॉर्म नहीं किया। इतना ही नहीं स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन ने पुलिस में ना जाने के लिए दबाव बनाया। मामला मीडिया में आने के बाद स्कूल ने पुलिस को जानकारी दी। उन्होंने कहा, मंगलवार को बच्चे को स्कूल छोडऩे के बाद मैं कोर्ट चला गया था। थोड़ी देर बाद स्कूल से फोन आया कि बच्चे को चोट लग गई है। मैं पत्नी को लेकर स्कूल पहुंचा। जहां पता चला कि बच्चे पर चाकू से हमला किया गया था। उन्होंने चौंकाने वाला आरोप लगाया कि बच्चे को स्कूल की एक लडक़ी ने हाथपैर बांधकर बाथरूम में बंद किया और चाकू से वार किया। हालांकि, इसकी वजह वे नहीं बता पाए।

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मालवा-निमाड़ के आदिवासी जिले झाबुआ और धार की विधानसभा सीटों को लेकर भाजपा ज्यादा चिंतित है। विधानसभा चुनाव में टिकट को लेकर इस बार रणनीतिकार लगातार मंथन कर रहे हैं और मौजूदा कुछ विधायकों के टिकट इस बार दोनों जिलों में काटे जाएंगे, या फिर उन्हें दूसरी विधानसभा सीटों से लड़ाया जाएगा।

संगठन को चार सीटों को लेकर फीडबैक मिला है कि, यदि चेहरे नहीं बदले तो पार्टी को उसकी कीमत चुनाव में चुकाना होगी। आदिवासी अंचल कभी कांग्रेस का गढ़ रहा है। पहले यहां के लोग चुनाव में 'पंजे' के अलावा कोई दूसरे चुनाव चिन्ह पर विश्वास ही नहीं करते थे। भाजपा ने यहां अपनी जमीन तैयार करने के लिए काफी मेहनत की।
18 साल पहले भाजपा ने झाबुआ में हिंदू संगम के जरिए आदिवासी परिवारों में पैठ बनाई और उसका राजनीतिक फायदा भी मिला। तब झाबुआ जिले की सभी सीटें भाजपा ने जीती थीं, लेकिन बाद में आरएसएस की गतिविधियां कमजोर पड़ती गई। हालांकि इसके बाद भाजपा को कभी आदिवासी जिलों की विधानसभा सीटों पर 'शून्य" का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन दोनों जिलों की ज्यादातर सीटों का मिजाज 'एक बार इसको, एक बार उसको मौका दो" जैसा है।

इस बार परेशानी की वजह भी यही है। पिछली बार दोनों जिलों में भाजपा के प्रत्याशी ज्यादा जीते थे, ऐसे में इस बार उन सीटों पर जनप्रतिनिधियों के खिलाफ एंटीइंकमबेंसी जनता में नजर आ रही है। झाबुआ जिले में सरकार ने विकास के कई काम करवाए हैं। सड़कों का जाल गांवों तक बिछा है, आवास योजना का भी लाभ काफी दिया गया। इतने कामों के बावजूद फीडबैक भाजपा के पक्ष में नहीं होने से रणनीतिकार आश्चर्यचकित हैंकुक्षी और गंधवानी सीट को लेकर भाजपा ने विशेष रणनीति तैयार की है और यहां पार्टी दमदार उम्मीदवार खोज रही है। जिले की दूसरी पांच सीटों में से तीन पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं। उधर, झाबुआ जिले की तीन सीटों पर भी लड़ाई चेहरे की है।

थांदला विधानसभा सीट के लिए पिछली बार कांग्रेस और भाजपा दोनों ही उम्मीदवार के चयन पर गच्चा खा गई थी और जीत भाजपा के बागी उम्मीदवार कलसिंह भाबर को मिली थी। बागी उम्मीदवार की भाजपा में घर वापसी हो गई, लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी इस बार उन्हें ही मैदान में उतार सकती है। पेटलवाद सीट के लिए निर्मला भूरिया पर संगठन फिर विश्वास जता सकता है। झाबुआ सीट पर संघ की पसंद को संगठन तवज्जो देगा, क्योंकि यहां लोगों के बीच भी संघ का नेटवर्क है। आलीराजपुर जिले की दोनों सीटों के मामले में संगठन को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है।दोनों ही जिलों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने कमान संभाल ली है और बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। नाराज नेताओं को मनाया जा रहा है और बैठकों के माध्यम से घर बैठे कार्यकर्ताओं को मैदान में उतरने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उधर, संभागीय संगठन मंत्री जयपाल सिंह चावड़ा के दौरे भी लगातार दोनों जिलों में होते रहे हैं और वे पदाधिकारियों से संपर्क में रहते हैं। संभाग में सबसे ज्यादा वे इन जिलों की सीटों पर ही फोकस कर रहे हैं।

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देशभर में पटाखों के उत्पादन, उनको बेचने और स्टॉक पर पाबंदी की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि दिवाली पर लोग रात 8-10 बजे तक ही पटाखे चला सकेंगे। यह आदेश सभी धर्मों के त्यौहारों पर लागू होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि जो पटाखें चलाए जाएं वो कम धुएं और आवाज वाले हों ताकि प्रदूषण ना फैले। सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों की बिक्री पर से भी कुछ शर्तों के साथ रोक हटाई है। इसके तहत पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगा दी है।ससे पहले जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने कहा, हालांकि यह मामला सोमवार की सूची में शामिल था, लेकिन इस पर निर्णय 23 अक्टूबर को सुनाया जाएगा।

र्कोर्ट ने 28 अगस्त को फैसला सुरक्षित दरअसल, वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचने के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर देशभर में पटाखों पर रोक लगाने की मांग की गई थी। पीठ ने इस मुद्दे पर याचिकाकर्ता, पटाखा निर्माता केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की दलीलों को सुनने के बाद कहा था कि पटाखों से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव और इसके व्यापार के बीच एक संतुलन रखना होगा।

पीठ का कहना था कि जहां पटाखा निर्माताओं को अपने जीविकोपार्जन का मूल अधिकार प्राप्त है वहीं 130 करोड़ लोगों को भी अच्छे स्वास्थ्य का मूल अधिकार प्राप्त है।रख लिया था। बता दें कि शीर्ष कोर्ट ने 2017 में दिल्ली-एनसीआर में दीपावली पर पटाखों की बिक्री पर पासुनवाई के दौरान पटाखा निर्माताओं ने दलील दी थी कि दीपावली के बाद बढ़ने वाले वायु प्रदूषण के लिए सिर्फ पटाखे जिम्मेदार नहीं हैं और सिर्फ इस वजह से पूरे उद्योग को बंद करने का आदेश देना न्यायसंगत नहीं होगा। सुनवाई के दौरान पीठ ने बच्चों में श्वसन संबंधी दिक्कतों के बढ़ने पर चिंता जताते हुए पटाखों पर पूरी तरह से या फिर आंशिक प्रतिबंध लगाने की बात कही थी।बंदी लगा दी थी।

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वसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे का चुनाव मैदान में उतरना महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ी घटना है। आदित्य ठाकरे का चुनाव लडऩे का फैसला राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को राजनीति का पाठ पढ़ाने और साथ ही राह दिखाने वाला है। एक समय था जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी से अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का बार-बार आग्रह किया, लेकिन राहुल ने उनका प्रस्ताव नकार दिया। दरअसल राहुल गांधी के चाटुकारनुमा सलाहकारों ने यह तर्क दिया कि गांधी परिवार का सदस्य होने के नाते उन्हें केवल प्रधानमंत्री पद का दावेदार होना चाहिए। राहुल गांधी यह समझ नहीं पाए कि देश और समाज, विशेषकर युवाओं का मिजाज बदल चुका है और राजनीति में केवल उन लोगों की पूछ-परख होगी जिनके पास सार्वजनिक जीवन में कुछ विशेष उपलब्धियां होंगी। राहुल गांधी की तरह प्रियंका गांधी वाड्रा भी आम जनता और कांग्रेसजनों की भावनाएं समझ नहीं पा रहीं हैं। यदि वह वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चुनाव हार भी जातीं तो भी एक लड़ाका के तौर पर सामने आतीं, लेकिन उन्होंने चुनाव लडऩे से इन्कार करके खुद को रण छोडऩे वाला नेता ही साबित किया। अगर उन्हें चुनाव लडऩा ही नहीं था तो फिर उनकी ओर से ऐसी संभावना नहीं उभारी जानी चाहिए थी। लोकसभा चुनाव के बाद से प्रियंका उत्तर प्रदेश की रट लगाए जा रही हैं, लेकिन प्रदेश में उनकी सक्रियता केवल गाहे-बगाहे ही नजर आती है। न तो प्रियंका का दिल्ली से मोह छूट रहा है और न ही उनकी राजनीतिक गतिविधियां सोशल मीडिया से आगे जा पा रही हैं। राहुल और प्रियंका गांधी के विपरीत आदित्य ठाकरे अपने लक्ष्य को लेकर बहुत साफ हैैं। खांटी विचारधारा यानी कोर आइडियोलॉजी को लेकर शिवसेना के मन में कोई संशय नहीं है। आर्थिक मामलों और खासकर रोजगार के साथ-साथ सड़क, बिजली, पानी जैसी सुविधाओं की कमी को लेकर सेना केंद्र की भाजपा सरकार को बिल्कुल नहीं बख्शती। उसका अपना आकलन है कि एक राज्य स्तर की पार्टी होने के नाते उसका अस्तित्व इन मुद्दों से जुड़ा हुआ है। कांग्रेस की स्थिति भिन्न है। कांग्रेस में विचारधारा के नाम पर 2014 से अनेक प्रयोग किए जा चुके हैैं, लेकिन उनसे कोई लाभ नहीं हुआ। संगठन की कमजोरी के चलते बंगाल, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में क्षेत्रीय राजनीतिक दल या तो कांग्रेस को मुंह लगाने को तैयार नहीं हैैं या फिर कुछ सीटों का लालच दे कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में पार्टी की किरकिरी होती जा रही है। पिछले कुछ महीनों से आदित्य ठाकरे ने अपनी और साथ ही अपनी पार्टी की छवि बदलने का प्रयास किया है। चाहे समुद्र किनारे गंदगी साफ करने का का मामला हो या लोकल बस और ट्रेन में सफर करने का या फिर प्लास्टिक के खिलाफ मुहिम छेडऩे का, आदित्य ठाकरे जमीनी स्तर पर जनता और उससे जुड़े मुद्दों के साथ खड़े नजर आते हैं। यह सही है कि ठाकरे परिवार हर लिहाज से नेहरू-गांधी परिवार से भिन्न है, लेकिन एक समानता जरूर है कि दोनों परिवारों के राजनीतिक सदस्यों को वोट और सियासत पर पकड़ को लेकर एक गुमान था। वह अपने आप को सर्वप्रिय और सबसे ऊपर समझते आ रहे थे। 2014 और उसके बाद की राजनीति ने उनके कस-बल ढीले कर दिए, लेकिन शायद ऐंठन है कि जाती नहीं। जो भी हो, यह कहा जा सकता है कि आदित्य ठाकरे को यह समझ आ गया है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के युग में भाजपा नेताओं को मातोश्री में बार-बार तलब नहीं किया जा सकता और न ही बड़बोले बयानों या मुखपत्र की बेलगाम संपादकीय टिप्पणियों से जनसमर्थन जुटाया जा सकता है। वैसे आदित्य ठाकरे का चुनाव लडऩे का फैसला चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि भाजपा का महाराष्ट्र में जनाधार लगातार बढ़ता जा रहा है। केवल नरेंद्र मोदी के राजनीतिक पराक्रम पर भाजपा अस्सी फीसद सीटों पर जीतने की क्षमता रखती है। इसी कारण भाजपा की पुरानी और विश्वसनीय सहयोगी शिवसेना अपनी कामयाबी को लेकर इतनी आश्वस्त नहीं है। यदि 24 अक्टूबर को यानी नतीजे वाले दिन शिवसेना भाजपा के मुकाबले में नजर नहीं आती तो यह आदित्य ठाकरे की विफलता को दर्शाएगा। आदित्य ठाकरे का चुनावी मैदान में उतरना तभी सार्थक सिद्ध होगा जब शिवसेना की कामयाबी भाजपा से बेहतर या फिर बराबर हो। 29 साल के आदित्य ठाकरे शायद यह बखूबी समझ गए हैैं कि शिवसेना पचास सीट जीत कर न तो भाजपा की बराबरी कर पाएगी और न ही अपने महत्वाकांक्षी लोगों को शिवसेना से भाजपा में जाने से रोक पाएगी। भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब बड़ी और चुनावी दृष्टि से कामयाब पार्टी ने अपनी सहयोगी अथवा मित्र पार्टी पर कब्जा जमा लिया। देखना है कि महाराष्ट्र में क्या होता है? साफ है कि इस समय महाराष्ट्र की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर है। शिवसेना को भाजपा से लगातार खतरा महसूस हो रहा है और उसका विचारधारा पर आधारित विश्वास डगमगा गया है, लेकिन दोनों अलग होने को तैयार नहीं हैं। भाजपा के आकलन में मित्रवत शिवसेना विपक्षी सेना के मुकाबले सस्ता सौदा है। शिवसेना भी अपने बनाए हुए इस भ्रम से प्रसन्न है कि महाराष्ट्र में उसके बगैर भाजपा का काम नहीं चल सकता, लेकिन चुनाव के बाद यह स्थिति बदल सकती है। 

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