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गीता के ज्ञान पर व्यर्थ का विवाद, भारतीय संस्कृति पर सवाल खड़े करना वामपंथियों की पुरानी आदत

सिद्ध चिंतक मारकस गार्वी लिखते हैं कि अपने अतीत, मूल और संस्कृति के ज्ञान के बिना व्यक्ति अथवा समाज एक जड़हीन वृक्ष की तरह है। अतीत की ओर देखने का अर्थ भविष्य से मुंह मोडऩा नहीं है, क्योंकि अतीत भविष्य की प्रशस्त राह बनाता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो वामपंथियों, छद्म उदारवादियों और औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त अंग्रेजीपरस्त बुद्धिजीवियों ने अपने गौरवशाली अतीत को न केवल हमेशा नकारा, बल्कि उसे हिकारत भरी दृष्टि से भी देखा। इसका ताजा उदाहरण है चेन्नई के अन्ना यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग कोर्स में भगवद्गीता को शामिल करने पर उठा विवाद। द्रमुक नेता स्टालिन और वामपंथी नेता सीताराम येचुरी के साथ-साथ कई बुद्धिजीवियों ने इसे आरआरएस और भाजपा का हिंदुत्ववादी एजेंडा बताकर इसके विरोध में विवाद खड़ा कर दिया। इसके कई पहलू हैं। एक तो यह कि इंजीनियरिंग कोर्स में दर्शनशास्त्र और भगवद्गीता का क्या औचित्य? दूसरे, भगवद्गीता के माध्यम से हिंदू धर्म को आरोपित किया जा रहा है। दर्शनशास्त्र ही पढ़ाना हो तो इसमें कुरान, बाइबिल आदि क्यों नहीं शामिल हों? यह भी कहा जा रहा है कि भगवद्गीता पलायनवाद को बढ़ावा देगी। एक आरोप यह भी है कि भगवद्गीता के माध्यम से संस्कृत द्वारा तमिल और द्रविड़ संस्कृति पर हमला है। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार अन्ना यूनिवर्सिटी ने इंजीनियरिंग में भगवद्गीता को शामिल किया। एआईसीटीई देश में इंजीनियरिंग और टेक्निकल शिक्षा का नियमन करती है। उसके मॉडल पाठ्यक्रम के अनुसार इंजीनियरिंग में मानविकी और सामाजिक विज्ञान भी पढ़ाए जाएंगे, ताकि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हो। एआईसीटीई ने ऐसे 32 विषय सुझाए हैं जिनमें अन्ना विश्वविद्यालय ने 'भारतीय संविधानÓ, 'अंग्रेजीÓ, 'व्यावसायिक संचारÓ, 'फिल्म मूल्यांकन बोधÓ और 'दर्शन और नैतिकताÓ जैसे छह कोर्स शुरू किए हैं। इनमें से कोई अनिवार्यता नहीं है, छात्र किसी भी विकल्प का चयन कर सकते हैं। फिर भी प्रश्न उठाया गया कि इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में दर्शनशास्त्र या फिल्म मूल्यांकन-बोध आदि क्यों? दरअसल एक संतुलित और सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण में ऐसे कोर्स बहुत सहायक होते हैं। विभिन्न नवीनतम शोधों में पाया गया है कि जीवन में सफल होने के लिए व्यक्ति में बौद्धिक गुणांक के अतिरिक्त भावात्मक गुणांक, सामाजिक गुणांक और विपरीत परिस्थिति गुणांक होना भी आवश्यक है। गीता या दर्शनशास्त्र अथवा मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विषय इसमें बहुत सहायक होते हैं। अमेरिका के विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग डिग्री के लिए सामाजिक विज्ञान के कई विषय पढऩे अनिवार्य हैं। अपने यहां भी आइआइटी में मानविकी का पूरा एक विभाग है। एक आरोप यह भी है कि यह शिक्षा का भगवाकरण या हिंदुकरण है। यहां यह समझना जरूरी है कि भगवद्गीता बाइबिल या कुरान की तरह विशुद्ध धार्मिक ग्रंथ नहीं है। इसे एक दर्शन ग्रंथ के रूप में देखा जाता है जो कर्म और ज्ञान का संदेश देता है। महात्मा गांधी से लेकर प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक-दार्शनिक एल्डस हक्सले, अमेरिकी चिंतक एवं गांधीजी के दार्शनिक गुरु हेनरी डेविड थोरो, अमेरिकी वैज्ञानिक एवं परमाणु बम के जन्मदाता रॉबर्ट ओपेनहाइमर और स्विट्जरलैंड के विख्यात मनोविश्लेषक कार्ल जंग और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भगवद्गीता के बड़े प्रशंसक रहे हैं। यह भी ध्यान रहे कि अन्ना विश्वविद्यालय में भगवद्गीता एक स्वतंत्र कोर्स के रूप में नहीं, बल्कि दर्शनशास्त्र का हिस्सा है जिसमें भारतीय और पश्चिमी दर्शन का मिश्रण है। इसमें सुकरात, प्लेटो और फ्रांसिस बेकन और मिशेल फूको पर अध्याय भी शामिल हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि अनेक देशों में इंजीनियरिंग आदि में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य है। दक्षिण कोरिया में इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में ईसाई मजहब की शिक्षा अनिवार्य है। एक आरोप यह भी है कि भगवद्गीता के माध्यम से तमिल भाषा और द्रविड़ संस्कृति पर संस्कृत और तथाकथित आर्य संस्कृति को थोपा जा रहा है। यह बेतुका आरोप है, क्योंकि खुद अन्ना यूनिवर्सिटी ने कहा है कि यह कोर्स अनिवार्य विषय नहीं है। तब इसमें संस्कृत थोपने जैसी बात कहां से आती है? फिर यह भी कि गीता को तमिल या अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाया जाएगा। दरअसल आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सियासी फायदे के लिए द्रमुक तरह-तरह की तिकड़म कर रही है। इसी क्रम में तमिल-संस्कृत अथवा द्रविड़-आर्य संस्कृति का नकली विवाद खड़ा कर रही है। यहां यह जानना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि जिस तमिल- संस्कृत का द्वंद्व पैदा करने की कोशिश की जा रही है उसके बारे में इंडो-यूरोपीय तुलनात्मक ऐतिहासिक भाषाविज्ञान और द्रविड़ भाषा विज्ञान के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ प्रो. थॉमस बरो का शोधकार्य 'लोनवर्डस इन संस्कृतÓ (1946) और 'कलेक्टेड पेपर्स ऑन द्रविडिय़न लिंग्विस्टिक्स (1968) दर्शाता है कि संस्कृत के हजारों शब्द कुछ परिवर्तनों के साथ तमिल भाषा में शामिल हो चुके हैं और इसी तरह संस्कृत ने बड़ी संख्या में तमिल से शब्द ग्रहण किए हैं। भगवद्गीता को आर्य संस्कृति से जोडऩा और द्रविड़ संस्कृति को इससे अलग बताते हुए इस पर हमले का झूठा वितंडा खड़ा करना वामपंथी और छद्म उदारवादी बुद्धिजीवियों का पुराना शगल रहा है।
इसी क्रम में ये आर्यों को बाहर से आया बताते हैं, जबकि हाल में हरियाणा के राखीगड़ी की खोदाई में मिले नरकंकाल-अवशेषों के डीएनए अध्ययन में हार्वर्ड और प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के अध्येताओं ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है कि आर्य बाहर से भारत में आए थे। वामपंथी व उदारवादी बुद्धिजीवियों को भारतीय परंपरा-संस्कृति में से कुछ भी ठीक नहीं लगता, जबकि भगवद्गीता का चिंतन सार्वदेशिक, सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। अमेरिकी चिंतक व गांधी जी के दार्शनिक गुरु हेनरी डेविड थोरो के इस कथन को ये लोग न भूलें कि वेद-उपनिषद के महान शिक्षण में संप्रदायवाद-अलगाव का कोई स्पर्श नहीं है। यह सभी युगों और राष्ट्रीयताओं के लिए है और महान ज्ञान की प्राप्ति के लिए उत्तम 
मार्ग है। 

'प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी...

आईईटी कॉलेज में हुआ जागरण एवं भण्डारा
जयपुर टाइम्स
अलवर (निसं.)। मत्स्य औद्योगिक क्षेत्र मेें स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलोजी में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी शारदीय नवरात्रों के अवसर पर माँ दुर्गे का भव्य जागरण एवं विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम संयोजक कॉलेज प्राचार्य डॉ. अनिल कुमार शर्मा ने बताया कि धार्मिक कार्यक्रमों की इस श्रृंखला में घट स्थापना, रामचरित मानस पाठ, जागरण एवं भण्डारे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ आईईटी ग्रुप चेयरमैन डॉ. वी के अग्रवाल, निदेशिका डॉ. मंजू अग्रवाल ने धार्मिक विधि विधान से किया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण माता रानी का भव्य दरबार, जिसमें तरह-तरह के फूल और रंग-बिरंगी लाइटें सबकों आकर्षित कर रही थी, माता का गुणगान करने वाली भक्त मण्डली ने जैसे ही प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी भक्ति गाया तो सभी लोग अपने स्थान पर खड़े होकर नाचते हुए भाव विभोर हो गए और देर रात तक नाचते रहे। कार्यक्रम में एमआईए क्षेत्र के कामालपुर, नाहरपुर घेघोली, गुंदपुर, भजींट, लोहिया तिबारा आदि क्षेत्रों से बड़ी सं या में माता के भक्त जागरण देखने के लिए कॉलेज प्रांगण में आए।

शक्ति बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती, इसीलिए नवरात्रि में शक्ति उपासना का महापर्व आता है

रतीय संस्कृति उत्सवधर्मी संस्कृति है। कृषि और शिल्प प्रधान देश होने के कारण प्राय: हमारे सभी उत्सव फसलों और शक्ति, समृद्धि के साथ जुड़े होते हैं। वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर फसलें पककर अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए तत्पर हो उठती हैं। धरती शस्य श्यामला हो उठती है और इसके बाद शुरू होता है श्री और शक्ति की उपासना, असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक दशहरा यानी विजयोत्सव। फिर दीपावली का पावन पर्व आता है। शरद ऋतु की समाप्ति के बाद सरस्वती पूजन के साथ वसंत का उत्सव आरंभ हो जाता है। आकुल चित्त इस वसंत का अधिष्ठान बन जाता है। उत्सवों की यह शृंखला ही भारतीय संस्कृति का प्राण है। जीवंत संस्कृति का यह चक्र अनवरत घूमता रहता है, ताकि हम सत्य से विमुख न हों और इस प्रकार अपनी भीतरी शक्ति से विमुख न हों। यही शक्ति पूरे भारत की आंतरिक शक्ति है। आखिर इस शक्ति का स्वरूप क्या है? शक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए कतिपय बिंदुओं की ओर दृष्टिपात करना आवश्यक है। शक्ति उन्माद न बनने पाए और सत्य का साहस के साथ उद्घोष कर पाए, यही शक्ति का स्वधर्म है।
 जैसे हवा का स्वधर्म प्राणियों को प्राणवायु देना है, सूर्य का धर्म ऊर्जा, अग्नि का स्वधर्म दाहकता, जल का स्वधर्म शीतलता है। नि:संदेह अहिंसा सबसे बड़ा मानवीय आदर्श है, परंतु दूसरी तरफ हिंसा अथवा रक्तपात का प्रतिकार न करना मनुष्य के भीतर की करुणा-वृत्ति का दुरुपयोग है। किसी मानवता विरोधी प्राणी द्वारा की गई हिंसक घटना के बाद बेसहारा माता-पिता, विधवा स्त्री, अनाथ बच्चे, अपंग हो गए सिपाही और निरीह लोगों की पुकार को सुनकर भी शक्ति के चुप रहने को अहिंसा नहीं माना जा सकता। शक्ति का अपना स्वाधीन चिंतन होता है। बिना किसी की पक्षधरता के उसे संहार के लिए तैयार होना पड़ता है, संहार के लिए काली बनना पड़ता है और रक्तबीजों को समूल नष्ट करने के लिए कर में खप्पर एवं खड्ग धारण करना पड़ता है। यह शक्ति ही हमें स्वाधीन चिंतन करने की प्रेरणा देती है। हिंसा अथवा अहिंसा की पक्षधरता से पृथक यह निष्पक्ष निर्णय के हुंकार का ओज भरती है कि इस परिस्थिति विशेष में करुणा की उपयोगिता है या कटार की? इसलिए त्रिशक्तियों के अनेक हाथों में विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र होते हैं जिनसे वह राक्षसी वृत्तियों का संहार करती है और सत्य की स्थापना करती है। इस सत्य की स्थापना अहिंसा से भी हो सकती है और अहिंसा के मार्ग में बाधा आने पर हिंसा और आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश के द्वारा भी स्थापित की जाती है। इसलिए भारत में समय-समय पर हम शक्ति की आराधना, साधना करते हैं ताकि हम उचित निर्णय ले सकें। शक्ति को किसी का पक्षधर नहीं होना चाहिए। उसे सदैव स्वाधीन चिंतन के पक्ष में खड़ा रहना चाहिए। मनुष्य के भीतर पक्षधरता तभी आती है जब वह दूसरों के चिंतन से प्रभावित होता है। प्रभु श्रीराम भी युद्ध से पूर्व शक्ति अर्जन और विजय की कामना से शक्ति की आराधना करते थे। शक्ति स्त्री रूपा है। भिन्न दर्शन के प्रतिपादकों ने किसी न किसी रूप में शक्ति तत्व को स्वीकार किया है। सांख्य के प्रकृति पुरुष में प्रकृति उसी शक्ति का प्रतीक है। वही लक्ष्मी, गौरी, सरस्वती का रूप धारण करती है। दुर्गा, काली, शिवा, धात्री आदि अनेक नामों से हम अखिल ब्रह्मांड में मातृ तत्व के रूप में व्याप्त इसी एक मात्र शक्ति का आह्वान करते हैं। मां की तरह कोई शक्ति निरंतर हमारा सृजन और पालन कर रही है। हम सब उसकी संतान हैं, परंतु जब कभी अहंकार में उस मां की ऊर्जा को नकारने का प्रयास करते हैं, उसकी सृष्टि को बाधा पहुंचाते हैं तो वह चंडी का रूप धारण कर हमें रोकती है। जब उसकी अवहेलना कर मानव अपनी शक्ति का प्रयोग नकारात्मक ढंग से हिंसा के लिए करने लगता है तभी वह नकारात्मक शक्तियों से घिरकर अशांत होता है। शक्ति का सकारात्मक उपयोग इसीलिए अपेक्षित होता है। इसी साधना के लिए महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा है कि संपूर्ण मानवता की विजय के लिए शक्ति का समन्वित रूप अपेक्षित है। शक्ति मानवता के पक्ष में खड़ी होती है। इस शक्ति को नकारने से शिव भी शव हो सकते हैं। श्री और शक्ति के बिना सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसीलिए नवरात्र के रूप में शक्ति जागरण का महापर्व बार-बार आता है। अपने स्वाधीन चिंतन और निष्पक्ष निर्णय का अश्रुत स्वर बार-बार प्रसारित करता है। सुन सकें तो सुनें, हम मानव संतानें।

श्री दिगम्बर जैन भवयोदय अतिशय क्षेत्र रैवासा का वार्षिक मेला 29 सितम्बर को

जयपुर टाइम्स
सीकर ( निसं.)। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष अतिशय क्षेत्र रैवासा के वार्षिक मेले का आयोजन 29 सितम्बर को किया जाएगा।इस दिन प्रात: आर्यिका विभाश्री माताजी से आशीर्वाद प्राप्त कर दंग की नसियां से आचार्य ज्ञानसागर युवा मंच,जैन सोशल गु्रप, जैन वीर संगठन के संयुक्त तत्वाधान में पदयात्रा रैवासा पहुँचेगी।इस दिन सीकर के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी पदयात्रा द्वारा श्रद्धालु यहां आते है।कार्यकारी अध्यक्ष दीपचंद काला(दांता वाले)ने बताया कि कार्यक्रमों में सर्वप्रथम प्रात: मंदिर जी मे वृहद शांतिधारा, सुमतिनाथ मण्डल विधान एवं पूजन की क्रियाएं होंगी।इसके पश्चात नसियां जी मे जय जिनेन्द्र ग्रुप द्वारा विशाल रंगोली प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा।कार्यक्रमो में नसियां जी प्रांगण में दोपहर ध्वजारोहण के पश्चात दीप प्रज्वलन, चित्र अनावरण, अतिथि स्वागत, पारितोषिक वितरण, कलशाभिषेक , मंगल आरती आदि कार्यक्रम होंगे। इसके पश्चात भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी।
जैन श्रद्धालुओ हेतु सीकर से बसों की व्यवस्था भी रहेगी,जिसका संचालन जैन वीर संगम द्वारा किया जाएगा।

आज उत्तर पूजा के बाद गणेश विसर्जन, इसके लिए सुबह २ और शाम को एक मुहूर्त

जयपुर टाइम्स
जयपुर (कासं)। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति की स्थापना के बाद अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस दिन भी पिछले 10 दिनों की तरह पूजा, आरती और भोग लगाया जाता है। इसके बाद विसर्जन के समय फिर से पूजा की जाती है। इसे उत्तर पूजा भी कहा जाता है। फिर आरती कर विसर्जन मंत्र के साथ प्राण-प्रतिष्ठित मिट्टी की गणेश प्रतिमा का घर में ही विसर्जन किया जाना चाहिए ताकि 10 दिनों की पूजा का पूरा फल मिल सके। इस दिन त्याग और परोपकार का भी महत्व है। माना जाता है कि इस भावना से भगवान प्रसन्न होते हैं। 
जल में विसर्जन का महत्व : जल को पंच तत्वों में से एक माना गया है। इसमें घुलकर प्राण प्रतिष्ठित गणेश मूर्ति पंच तत्वों में सामहित होकर अपने मूल स्वरूप में मिल जाती है। जल में विसर्जन होने से भगवान गणेश का साकार रूप निराकार हो जाता है। जल में मूर्ति विसर्जन से यह माना जाता है कि जल में घुलकर परमात्मा अपने मूल स्वरूप से मिल गए। यह परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक भी है। सभी देवी-देवताओं का विसर्जन जल में ही होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है संसार में जितनी मूर्तियों में देवी-देवता और प्राणी शामिल हैं, उन सभी में मैं ही हूं और अंत में सभी को मुझमें ही मिलना है।


मिट्टी के गणेश, घर में ही विसर्जन
दैनिक भास्कर समूह कई वर्षों से 'मिट्टी के गणेश-घर में ही विसर्जन' अभियान चला रहा है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि हम अपने तालाब और नदियों को प्रदूषित होने से बचा सकें। इसलिए आप घर या कॉलोनी में कुंड बनाकर विसर्जन करें और उस पवित्र मिट्टी में एक पौधा लगा दें। इससे न सिर्फ ईश्वर का आशीर्वाद बना रहेगा, बल्कि उनकी याद भी घर-आंगन में महकती रहेगी। यह पौधा ब?ा होकर 

 

एकादशी पर ठाकुरजी ने किया जल विहार

जयपुर टाइम्स
 दूदू (निसं)। जलझूलनी (डोल) एकादशी पर कस्बे के प्राचीन मंदिरों मे स्थापित श्रीठाकुरजी ने श्रद्धालुओं के कंधे पर फूल मालाओं से सजी-धजी पालकियों मे विराजमान होकर कस्बे के मुख्य मार्गों से ढोल बाजों के साथ  निकलकर कस्बे की सुखी तलाई नामक पानी से भरे तालाब मे जलविहार किया । इस दौरान श्रद्धालु हरिनाम कीर्तन करते हुये चल रहे थे।
 श्रद्धालु योगेश पारीक ने बताया कि कस्बे के गोपाल जी,चारभुजा नाथ जी,जगत श्रवण जी, मुरली मनोहर, राधाकिशन जी, सीताराम जी के मंदिरो से श्रीठाकुरजी पालकी मे जलविहार करने जाते है जबकि रघुनाथ जी मंदिर से श्रीठाकुरजी पालकी मे विराजमान होकर सजेधजे ट्रेक्टर से जलविहार के लिये जाते है। तालाब के किनारे पर सभी मंदिरो से आई श्रीठाकुरजी की पालकियों को विराजमान करके पूजा अर्चना व आरती करने के पश्चात प्रसाद वितरण कर पुन: निज मंदिरो मे ले जाया जाता है।इस अवसर पर ठाकुरजी की डोल देखने के लिये भारी संख्या मे श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है तथा मेला भी भरता है ।
 

मंगलकार्य के लिए जब न मिले मुहूर्त, चिंतामन करेंगे आपकी परेशानी दूर

उज्जैन (एजेंसी )। पुराणों में वर्णित प्राचीन अवंतिका नगरी, जिसे मौजूदा दौर में उज्जैन के नाम से जाना जाता है। यूं तो मोक्षदायिनी शिप्रा के घाटों और श्री महाकालेश्वर की भस्मारती के लिए विश्वभर में यह शहर अपनी पहचान रखता है लेकिन यहां पर कई ऐसे मंदिर भी हैं जो कि श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। ऐसे ही कुछ मंदिरों में प्रमुख है, गौरीनन्दन श्री गणेश का चिंतामन धाम। उज्जैन के ग्राम चिंतामन को भगवान के इसी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में आने वाले की सभी मन्नतें तो पूरी हो जाती हैं साथ ही किसी कारणवश मुहूर्त के बिना मांगलिक कार्य करने वालों के लिए यहां पाती के लग्न निकाले जाते हैं। मध्यभारत का पौराणिक नगर, उज्जैन अपने सांस्कृति वैभव के लिए जाना जाता है। यहां पर हर दिन कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। साथ ही यहां लगभग हर कदम पर मंदिर और दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। इस शहर को लेकर एक कहावत है कि यदि कोई बैलगाड़ी में अनाज की बोरियां लादकर ले जाए और एक-एक मुट्ठी अनाज यहां के मंदिरों में अर्पित करे, तो बारियों में भरा हुआ अनााज समाप्त हो जाएगा मगर, कुछ मंदिर ऐसे रह जाएंगे जहां अनाज नहीं चढ़ाया जा सका। से ही शहर में प्राण प्रतिष्ठित है श्री चिंतामन गणेश का मंदिर। यहां शिवसुत गजानन अपने तीन स्वरूपों में प्राण प्रतिष्ठित हैं। जिसमें एक स्वरूप है श्री चिंतामन, दूसरा सिद्धिविनायक गणेश और तीसरा इच्छामन। भगवान अपने इन तीनों रूपों में श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करते हैं।  मंदिर को लेकर किवदंती है कि भगवान गणेश एक वटवृक्ष में से प्रकट हुए थे। त्रेता युग में भगवान श्री राम जब राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म करने आए थे, उसी दौरान शिप्रा नदी के दक्षिण तट पर उनका आना हुआ था। भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने यहां पूजन किया था। कहा जाता है कि श्री गणेश के इन तीनों स्वरूपों का पूजन भगवान श्री राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण ने किया था। प्राचीन युग में यहां जंगल था, यहां भगवान श्री राम ने माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ विश्राम किया। मंदिर इतना जागृत है कि यहां आने वाले की हर मन्नत पूरी होती है। श्रद्धालु नया वाहन खरीदने पर, घर में मांगलिक कार्य होने पर सबसे पहले यहां आकर बप्पा को निमंत्रण देना नहीं भूलते। यहां बिना मुहूर्त के ही, मांगलिक कार्य संपन्न करवाए जाते हैं। मान्यता के अनुसार जब कुछ लोग मंगलकार्य को लेकर निकाले जाने वाले मुहूर्त के पसोपेश में होते हैं तो उन्हें यहां आकर समाधान मिल जाता है।भगवान की आरती में उपयोग किए जाने वाले फूल उनके चरणों में से लेकर मुहूर्त लिखवाने आए भक्त को दे दिए जाते हैं। भक्त फूल लेकर अपने घर चले जाते हैं। फूल इस बात का प्रमाण होते हैं कि भक्त बिना मुहूर्त के ही शुभकार्य कर सकता है और चिंतामन उसके कार्य को सफल करेंगे। इसके बाद जब लग्न या शुभकार्य संपन्न होता है तो श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

लोक देवता भर्तृहरि बाबा का भर मेला आज

जयपुर टाइम्स
अलवर (निसं.)। लोक देवता भर्तृहरि बाबा का भर मेला शुक्रवार हो भरेगा। बुधवार को पूजा अर्चना के साथ शुरु हुए मेले में जहां श्रद्धालुओं का मंदिर पहुंचना शुरू हो गया। वहीं भर्तृहरि के आसपास के गांवों के अलावा जिलेभर एवं अन्य प्रांतों से भी श्रद्धालुजन मेले में पहुंच रहे हैं। जिसके चलते मेला परिसर में श्रद्धालुओं की खासी भीड़  होने लगी है। मेला स्थल पर लोग निजी वाहनों, रोडवेज बसों एवं पैदल पहुंच  रहे हैं। 
मेले में दूर दराज से आए साधू संत श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र रहे। भर्तृहरि मेले में कई दिन पूर्व ही दूर दराज से साधू संत अपना डेरा जमा लेते हैं। ये साधू संत तरह-तरह के करतब दिखा लोगों को आकर्षित करते हैं। मेले में कनफडे साधुओं की संख्या अधिक रहती है। प्याऊ व भण्डारों का आयोजन  मेले के चलते भर्तृहरि धाम व आसपास के गांवों से आने वाले रास्तों, नटनी का बारा मार्ग आदि पर लोग प्याऊ लगा जलसेवा में जुटे रहे। मेला परिसर में कई जगह भण्डारों का आयोजन भी किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने 
प्रसादी पाई।
भर्तृहरि मेले में काली रंग की लाठी लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहती है। लाठी के विक्रेता कई दिन पूर्व आकर अपनी दुकान जमा लेते हैं। मेले के पहले दिन से मेला परिसर एवं आसपास के क्षेत्र में कई जगह लाठी विक्रेताओं की दुकान लग गई। 
मेले में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस कारण यहां घरेलू सामान की दुकानें भी लगी थी। लोग इन दुकानों पर घरेलू सामान खरीदते दिखे। वहीं बच्चों के मनोरंजन की दुकानों पर भी ग्रामीणों की भीड़ लगी थी।  इसके साथ ही मेले में सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद है। सुरक्षा व्यवस्था में लगे थानाधिकारी सुरेन्द्र कुमार ने बताया कि भृर्तहरि बाबा के लक्खी मेले में श्रद्वालुओं की अपार ाीड़ को देखते हुए सुरक्षा के लिए पुलिस ने पु ता इंतजाम किए हैं। यहां किसी प्रकार की अव्यवस्था नहंीं है। मेला शांतिपूर्ण चल रहा है।

भगवान श्री देवनारायण के धोक लगाएँगे 5 लाख श्रद्धालु

जगह जगह हुआ स्वागत, भामाशाहों का किया सम्मान
जयपुर टाइम् स
कोटपूतली (निसं.)। श्री देवनारायण जन कल्याण संस्थान के तत्वाधान में प्रतिवर्ष की भाँति टोंक-निंवाई स्थित श्री देवधाम जोधपुरिया जाने वाली गुर्जर समाज के आराध्य भगवान श्री देवनारायण की ध्वज पद यात्रा का बड़े ही सफलतापूर्वक आयोजन किया जा रहा है।
 संस्थान के प्रदेशाध्यक्ष शंकर लाल कसाणा ने बताया कि राजस्थान के विभिन्न जिलों समेत हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि राज्यों से करीब 5 लाख की संख्या में श्रद्धालु व ध्वज पद यात्री टोंक-निंवाई के श्री देवधाम जोधपुरिया में बुधवार को श्री देव धणी के धोक लगाएँगे। इस दौरान विशाल मेले का आयोजन भी संस्थान की देख रेख में किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि हजारों की संख्या में पदयात्री प्रतिदिन विभिन्न स्थानों से मेले में रवाना हो रहें हैं। 
हर तरह भजन, सत्संग के साथ नाचते गाते श्रद्धालु रंग बिरंगी ध्वज पताका लिए नजर आ रहे हैं। कोटपूतली से श्री देवनारायण सेवा समिति के तत्वाधान में रवाना हुई 28 वीं ध्वज पद यात्रा का मार्ग में आंतेला, शाहपुरा, चंदवाजी, गोनेर, चाकसू आदि जगहों पर स्थानीय मंडलों द्वारा स्वागत किया गया।
इस दौरान यात्रा में सहयोग करने वाले भामाशाहों का भी सम्मान किया गया। मंगलवार को निंवाई रात्रि विश्राम व भजन सत्संग का आयोजन हुआ। वहीं बुधवार को भगवान श्री देव महाराज के धोक लगाई जाएगी।

पाण्डुपोल हनुमानजी की देखी घर-घर ज्योत

जयपुर टाइम्स
अलवर (निसं.)। पाण्डुपोल हनुमान मेले के अवसर पर मंगलवार को जहां सरिस्का के घने जंगलों में स्थित हनुमान मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धाालुओं ने पहुंचकर हनुमानजी के दर्शन किए ओर अलवर में सुख-शांति व समृद्धि की कामना की। 
वहीं दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं में से किसी ने भण्डारा किया तो किसी ने बच्चों के जात-जडूले उतरवाए ओर किसी ने शुभ कार्य की मन्नत मांगी। पाण्डुपोल हनुमान मंदिर में अल सुबह आरती के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शन किए ओर आरती में भाग लेकर आशीर्वाद लिया। शाम तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इसी के साथ ही शाम को मंदिर में हनुमान जी की महाआरती की गई।
इधर पाण्डुपोल हनुमान जी के मेले के अवसर पर घर-घर में भी श्रद्धालुओं ने ज्योत देखी ओर चूरमे का भोग लगाया। वहीं शहर के अनेक हनुमान मंदिरों में भी दिनभर श्रद्धालुओं ने हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड के पाठ किए ओर प्रसाद बांटा। शहर के स्वर्ग  रोड स्थित श्री कल्याणकारी हनुमान मंदिर पर जन कल्याण सेवार्थ समिति की ओर से दाल- बाटी व चूरमे का हनुमान जी को भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया। समिति सचिव प्रेमचन्द जैन ने बताया कि इस मौके पर राप्राउ विद्यालय मीणा पाडी स्कूल  के 35 बच्चों को स्कूल डे्रस बांटी गई। 
जहां बच्चों ने खुशी व्यक्त कर भगवान से सभी की खुशहाली की कामना की। इस मौके पर सुन्दरकाण्ड के पाठ भी किए गए।
इसी तरहा भूरासिद्ध हनुमान मंदिर पुराना व नए में भी अनेक धार्मिक आयोजन हुए। जहां भण्डारे का भी आयोजन हुआ। महल चौक हजूरी गेट स्थित श्रीश्री 1008 डंडे वाले हनुमान मंदिर पर भी दिनभर श्रद्धालुओं ने हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड के पाठ किए। प्रसाद चढ़ाकर  मन्नत मांगी।         
 

पर्युषण पर्व : मोक्ष का साक्षात उपाय है मैं छोड़कर दूसरों को क्षमा करना : विद्यासागर जी महाराज

जयपुर टाइम्स
जयपुर (कासं)। पर्युषण पर्व मोह की नींद में सोए लोगों के लिए सबक लेकर आया है। इन दिनों संसार के मूल कारण- आठ कर्म छूट जाते हैं। कहा भी है- पर्वराज यह आ गया, चला जाएगा काल। परंतु कुछ भी ना मिला, टेढ़ी हमारी चाल॥ 
हमारी चाल टेढ़ी है, पर्वराज न आता है, न जाता है। हम चले जा रहे हैं। हमें सांसारिक संबंधों से छुट्टी लेनी है, परिश्रम से नहीं। आचार्यों ने वस्तु के स्वभाव को धर्म बताया है। दस प्रकार के क्षमादि भावों को धर्म कहते हैं। धर्म, अधर्म, आकाश और काल भी वस्तु है। सभी का अपना स्वभाव ही उनका धर्म है। तो आज हम कौन से धर्म का पालन करें, जिससे कल्याण हो। स्वभाव तो हमेशा धर्म रहेगा ही, लेकिन इस स्वभाव की प्राप्ति के लिए जो किया जाने वाला धर्म है वह है- 'खमादिभावो या दसविहो धम्मोÓ- क्षमादि भाव रूप दस प्रकार का धर्म आज से शुरू हो रहा है। क्षमा धर्म के लिए आज का दिन तय है। क्षमा धर्म की बड़ी महत्ता बताई गई है। करोड़ नारियल चढ़ाने में जितना फल मिलता है, उतना फल एक स्तुति से मिलता है और करोड़ स्तुति का फल एक बार जाप से मिलता है। जितना फल करोड़ जाप से मिलता है, उतना एक बार मन-वचन-काय को एकाग्रकर ध्यान से मिलता है। शारीरिक-वाचनिक-मानसिक क्रिया जितनी निर्मल होती जाती है, उतना फल मिलता जाता है। कोटि बार ध्यान से जो फल मिलता है, वह एक क्षमा से मिलता है। क्षमा से बैर नहीं रखना है। मोक्ष का साक्षात उपाय क्षमा है। आप आधि-व्याधि से तो दूर हो सकते हैं, पर उपाधि से दूर होना मुश्किल है, 'मैंÓ पना नहीं निकलता। आधि मानसिक चिन्ता को कहते हैं और व्याधि शारीरिक बीमारी है। 
उपाधि बौद्धिक विकार है। समाधि आध्यात्मिक है। क्षमा करने वाले अनंतचतुष्टय का अनुभव करते हैं। पर घाति चतुष्टय का क्या? वहां सुख अनंत है, यहां दुख अनंत है। आत्मा के अहित का कारण कषाय यानी राग-द्वेष जैसे अवगुण हैं। इन्हें हटाने पर ही क्षमा की सच्ची भावना आ पाएगी।     

हैदराबाद में 1 करोड़ से बनी भगवान गणेश की 61 फीट ऊंची और 50 टन वजनी मूर्ति

1954 से हर साल हैदराबाद के खैरताबाद में सबसे ऊंचे गणपति विराजित हो रहे
इस साल बारह मुखी द्वादशादित्य महागणपति विराजेंगे
देश में गणेशोत्सव में स्थापित होने वाली मूर्तियों में यह सबसे बड़ी होगी, क्रेन की मदद से विसर्जन किया जाएगा
जयपुर टाइम्स
हैदराबाद (एजेंसी)। सोमवार से गणेशोत्सव शुरू हो रहा है। हैदराबाद के खैरताबाद में गणपति की 61 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित की जाएगी। करीब 1 करोड़ रुपए की लागत से बनी यह मूर्ति 12 मुखी है। इसे श्री द्वादशादित्य महागणपति नाम दिया गया है। यहां 1954 से लगातार हर साल गणेशजी की विशाल मूर्ति स्थापित की जाती है। गणेश उत्सव के दौरान यहां स्थापित की जाने वाली मूर्ति देशभर में सबसे ऊंची होती है। सी. राजेंद्रन, वेंकट गुव्वाला और उनकी टीम के 150 सदस्यों ने हैदराबाद में यह मूर्ति बनाई। इसे बनाने की शुरुआत मई में हुई। इसमें तीन महीने से ज्यादा समय लगा। इसका वजन करीब 50 टन है। इसे पीओपी की मदद से बनाया गया है। यह देश की सबसे ऊंची बारह मुखी गणेश प्रतिमा है, जो गणेश उत्सव के दौरान स्थापित की जाएगी। इस साल गणेशजी की मूर्ति सूर्यदेव के 12 स्वरूपों से प्रेरित है।
खैरताबाद गणेश उत्सव समिति के ज्वाइंट सेक्रेटरी संदीप राज के अनुसार, उत्सव समिति का गठन 1954 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एस. शंकरय्या ने किया था। तब से हर साल यहां गणेश की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है। एस. शंकरय्या के बाद उनके भाई एस. सुदर्शन के साथ एस. राजकुमार और उनका परिवार गणेश उत्सव का आयोजन करता है। अब तक यहां स्थापित की गई मूर्तियों की औसत ऊंचाई 60 फीट रही है। 
गणेश उत्सव के दौरान इतनी ऊंची प्रतिमा कहीं और विराजमान नहीं की जाती।