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आज उत्तर पूजा के बाद गणेश विसर्जन, इसके लिए सुबह २ और शाम को एक मुहूर्त

जयपुर टाइम्स
जयपुर (कासं)। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति की स्थापना के बाद अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस दिन भी पिछले 10 दिनों की तरह पूजा, आरती और भोग लगाया जाता है। इसके बाद विसर्जन के समय फिर से पूजा की जाती है। इसे उत्तर पूजा भी कहा जाता है। फिर आरती कर विसर्जन मंत्र के साथ प्राण-प्रतिष्ठित मिट्टी की गणेश प्रतिमा का घर में ही विसर्जन किया जाना चाहिए ताकि 10 दिनों की पूजा का पूरा फल मिल सके। इस दिन त्याग और परोपकार का भी महत्व है। माना जाता है कि इस भावना से भगवान प्रसन्न होते हैं। 
जल में विसर्जन का महत्व : जल को पंच तत्वों में से एक माना गया है। इसमें घुलकर प्राण प्रतिष्ठित गणेश मूर्ति पंच तत्वों में सामहित होकर अपने मूल स्वरूप में मिल जाती है। जल में विसर्जन होने से भगवान गणेश का साकार रूप निराकार हो जाता है। जल में मूर्ति विसर्जन से यह माना जाता है कि जल में घुलकर परमात्मा अपने मूल स्वरूप से मिल गए। यह परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक भी है। सभी देवी-देवताओं का विसर्जन जल में ही होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है संसार में जितनी मूर्तियों में देवी-देवता और प्राणी शामिल हैं, उन सभी में मैं ही हूं और अंत में सभी को मुझमें ही मिलना है।


मिट्टी के गणेश, घर में ही विसर्जन
दैनिक भास्कर समूह कई वर्षों से 'मिट्टी के गणेश-घर में ही विसर्जन' अभियान चला रहा है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि हम अपने तालाब और नदियों को प्रदूषित होने से बचा सकें। इसलिए आप घर या कॉलोनी में कुंड बनाकर विसर्जन करें और उस पवित्र मिट्टी में एक पौधा लगा दें। इससे न सिर्फ ईश्वर का आशीर्वाद बना रहेगा, बल्कि उनकी याद भी घर-आंगन में महकती रहेगी। यह पौधा ब?ा होकर 

 

एकादशी पर ठाकुरजी ने किया जल विहार

जयपुर टाइम्स
 दूदू (निसं)। जलझूलनी (डोल) एकादशी पर कस्बे के प्राचीन मंदिरों मे स्थापित श्रीठाकुरजी ने श्रद्धालुओं के कंधे पर फूल मालाओं से सजी-धजी पालकियों मे विराजमान होकर कस्बे के मुख्य मार्गों से ढोल बाजों के साथ  निकलकर कस्बे की सुखी तलाई नामक पानी से भरे तालाब मे जलविहार किया । इस दौरान श्रद्धालु हरिनाम कीर्तन करते हुये चल रहे थे।
 श्रद्धालु योगेश पारीक ने बताया कि कस्बे के गोपाल जी,चारभुजा नाथ जी,जगत श्रवण जी, मुरली मनोहर, राधाकिशन जी, सीताराम जी के मंदिरो से श्रीठाकुरजी पालकी मे जलविहार करने जाते है जबकि रघुनाथ जी मंदिर से श्रीठाकुरजी पालकी मे विराजमान होकर सजेधजे ट्रेक्टर से जलविहार के लिये जाते है। तालाब के किनारे पर सभी मंदिरो से आई श्रीठाकुरजी की पालकियों को विराजमान करके पूजा अर्चना व आरती करने के पश्चात प्रसाद वितरण कर पुन: निज मंदिरो मे ले जाया जाता है।इस अवसर पर ठाकुरजी की डोल देखने के लिये भारी संख्या मे श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है तथा मेला भी भरता है ।
 

मंगलकार्य के लिए जब न मिले मुहूर्त, चिंतामन करेंगे आपकी परेशानी दूर

उज्जैन (एजेंसी )। पुराणों में वर्णित प्राचीन अवंतिका नगरी, जिसे मौजूदा दौर में उज्जैन के नाम से जाना जाता है। यूं तो मोक्षदायिनी शिप्रा के घाटों और श्री महाकालेश्वर की भस्मारती के लिए विश्वभर में यह शहर अपनी पहचान रखता है लेकिन यहां पर कई ऐसे मंदिर भी हैं जो कि श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। ऐसे ही कुछ मंदिरों में प्रमुख है, गौरीनन्दन श्री गणेश का चिंतामन धाम। उज्जैन के ग्राम चिंतामन को भगवान के इसी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में आने वाले की सभी मन्नतें तो पूरी हो जाती हैं साथ ही किसी कारणवश मुहूर्त के बिना मांगलिक कार्य करने वालों के लिए यहां पाती के लग्न निकाले जाते हैं। मध्यभारत का पौराणिक नगर, उज्जैन अपने सांस्कृति वैभव के लिए जाना जाता है। यहां पर हर दिन कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। साथ ही यहां लगभग हर कदम पर मंदिर और दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। इस शहर को लेकर एक कहावत है कि यदि कोई बैलगाड़ी में अनाज की बोरियां लादकर ले जाए और एक-एक मुट्ठी अनाज यहां के मंदिरों में अर्पित करे, तो बारियों में भरा हुआ अनााज समाप्त हो जाएगा मगर, कुछ मंदिर ऐसे रह जाएंगे जहां अनाज नहीं चढ़ाया जा सका। से ही शहर में प्राण प्रतिष्ठित है श्री चिंतामन गणेश का मंदिर। यहां शिवसुत गजानन अपने तीन स्वरूपों में प्राण प्रतिष्ठित हैं। जिसमें एक स्वरूप है श्री चिंतामन, दूसरा सिद्धिविनायक गणेश और तीसरा इच्छामन। भगवान अपने इन तीनों रूपों में श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करते हैं।  मंदिर को लेकर किवदंती है कि भगवान गणेश एक वटवृक्ष में से प्रकट हुए थे। त्रेता युग में भगवान श्री राम जब राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म करने आए थे, उसी दौरान शिप्रा नदी के दक्षिण तट पर उनका आना हुआ था। भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने यहां पूजन किया था। कहा जाता है कि श्री गणेश के इन तीनों स्वरूपों का पूजन भगवान श्री राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण ने किया था। प्राचीन युग में यहां जंगल था, यहां भगवान श्री राम ने माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ विश्राम किया। मंदिर इतना जागृत है कि यहां आने वाले की हर मन्नत पूरी होती है। श्रद्धालु नया वाहन खरीदने पर, घर में मांगलिक कार्य होने पर सबसे पहले यहां आकर बप्पा को निमंत्रण देना नहीं भूलते। यहां बिना मुहूर्त के ही, मांगलिक कार्य संपन्न करवाए जाते हैं। मान्यता के अनुसार जब कुछ लोग मंगलकार्य को लेकर निकाले जाने वाले मुहूर्त के पसोपेश में होते हैं तो उन्हें यहां आकर समाधान मिल जाता है।भगवान की आरती में उपयोग किए जाने वाले फूल उनके चरणों में से लेकर मुहूर्त लिखवाने आए भक्त को दे दिए जाते हैं। भक्त फूल लेकर अपने घर चले जाते हैं। फूल इस बात का प्रमाण होते हैं कि भक्त बिना मुहूर्त के ही शुभकार्य कर सकता है और चिंतामन उसके कार्य को सफल करेंगे। इसके बाद जब लग्न या शुभकार्य संपन्न होता है तो श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

लोक देवता भर्तृहरि बाबा का भर मेला आज

जयपुर टाइम्स
अलवर (निसं.)। लोक देवता भर्तृहरि बाबा का भर मेला शुक्रवार हो भरेगा। बुधवार को पूजा अर्चना के साथ शुरु हुए मेले में जहां श्रद्धालुओं का मंदिर पहुंचना शुरू हो गया। वहीं भर्तृहरि के आसपास के गांवों के अलावा जिलेभर एवं अन्य प्रांतों से भी श्रद्धालुजन मेले में पहुंच रहे हैं। जिसके चलते मेला परिसर में श्रद्धालुओं की खासी भीड़  होने लगी है। मेला स्थल पर लोग निजी वाहनों, रोडवेज बसों एवं पैदल पहुंच  रहे हैं। 
मेले में दूर दराज से आए साधू संत श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र रहे। भर्तृहरि मेले में कई दिन पूर्व ही दूर दराज से साधू संत अपना डेरा जमा लेते हैं। ये साधू संत तरह-तरह के करतब दिखा लोगों को आकर्षित करते हैं। मेले में कनफडे साधुओं की संख्या अधिक रहती है। प्याऊ व भण्डारों का आयोजन  मेले के चलते भर्तृहरि धाम व आसपास के गांवों से आने वाले रास्तों, नटनी का बारा मार्ग आदि पर लोग प्याऊ लगा जलसेवा में जुटे रहे। मेला परिसर में कई जगह भण्डारों का आयोजन भी किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने 
प्रसादी पाई।
भर्तृहरि मेले में काली रंग की लाठी लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहती है। लाठी के विक्रेता कई दिन पूर्व आकर अपनी दुकान जमा लेते हैं। मेले के पहले दिन से मेला परिसर एवं आसपास के क्षेत्र में कई जगह लाठी विक्रेताओं की दुकान लग गई। 
मेले में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस कारण यहां घरेलू सामान की दुकानें भी लगी थी। लोग इन दुकानों पर घरेलू सामान खरीदते दिखे। वहीं बच्चों के मनोरंजन की दुकानों पर भी ग्रामीणों की भीड़ लगी थी।  इसके साथ ही मेले में सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद है। सुरक्षा व्यवस्था में लगे थानाधिकारी सुरेन्द्र कुमार ने बताया कि भृर्तहरि बाबा के लक्खी मेले में श्रद्वालुओं की अपार ाीड़ को देखते हुए सुरक्षा के लिए पुलिस ने पु ता इंतजाम किए हैं। यहां किसी प्रकार की अव्यवस्था नहंीं है। मेला शांतिपूर्ण चल रहा है।

भगवान श्री देवनारायण के धोक लगाएँगे 5 लाख श्रद्धालु

जगह जगह हुआ स्वागत, भामाशाहों का किया सम्मान
जयपुर टाइम् स
कोटपूतली (निसं.)। श्री देवनारायण जन कल्याण संस्थान के तत्वाधान में प्रतिवर्ष की भाँति टोंक-निंवाई स्थित श्री देवधाम जोधपुरिया जाने वाली गुर्जर समाज के आराध्य भगवान श्री देवनारायण की ध्वज पद यात्रा का बड़े ही सफलतापूर्वक आयोजन किया जा रहा है।
 संस्थान के प्रदेशाध्यक्ष शंकर लाल कसाणा ने बताया कि राजस्थान के विभिन्न जिलों समेत हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि राज्यों से करीब 5 लाख की संख्या में श्रद्धालु व ध्वज पद यात्री टोंक-निंवाई के श्री देवधाम जोधपुरिया में बुधवार को श्री देव धणी के धोक लगाएँगे। इस दौरान विशाल मेले का आयोजन भी संस्थान की देख रेख में किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि हजारों की संख्या में पदयात्री प्रतिदिन विभिन्न स्थानों से मेले में रवाना हो रहें हैं। 
हर तरह भजन, सत्संग के साथ नाचते गाते श्रद्धालु रंग बिरंगी ध्वज पताका लिए नजर आ रहे हैं। कोटपूतली से श्री देवनारायण सेवा समिति के तत्वाधान में रवाना हुई 28 वीं ध्वज पद यात्रा का मार्ग में आंतेला, शाहपुरा, चंदवाजी, गोनेर, चाकसू आदि जगहों पर स्थानीय मंडलों द्वारा स्वागत किया गया।
इस दौरान यात्रा में सहयोग करने वाले भामाशाहों का भी सम्मान किया गया। मंगलवार को निंवाई रात्रि विश्राम व भजन सत्संग का आयोजन हुआ। वहीं बुधवार को भगवान श्री देव महाराज के धोक लगाई जाएगी।

पाण्डुपोल हनुमानजी की देखी घर-घर ज्योत

जयपुर टाइम्स
अलवर (निसं.)। पाण्डुपोल हनुमान मेले के अवसर पर मंगलवार को जहां सरिस्का के घने जंगलों में स्थित हनुमान मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धाालुओं ने पहुंचकर हनुमानजी के दर्शन किए ओर अलवर में सुख-शांति व समृद्धि की कामना की। 
वहीं दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं में से किसी ने भण्डारा किया तो किसी ने बच्चों के जात-जडूले उतरवाए ओर किसी ने शुभ कार्य की मन्नत मांगी। पाण्डुपोल हनुमान मंदिर में अल सुबह आरती के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शन किए ओर आरती में भाग लेकर आशीर्वाद लिया। शाम तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इसी के साथ ही शाम को मंदिर में हनुमान जी की महाआरती की गई।
इधर पाण्डुपोल हनुमान जी के मेले के अवसर पर घर-घर में भी श्रद्धालुओं ने ज्योत देखी ओर चूरमे का भोग लगाया। वहीं शहर के अनेक हनुमान मंदिरों में भी दिनभर श्रद्धालुओं ने हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड के पाठ किए ओर प्रसाद बांटा। शहर के स्वर्ग  रोड स्थित श्री कल्याणकारी हनुमान मंदिर पर जन कल्याण सेवार्थ समिति की ओर से दाल- बाटी व चूरमे का हनुमान जी को भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया। समिति सचिव प्रेमचन्द जैन ने बताया कि इस मौके पर राप्राउ विद्यालय मीणा पाडी स्कूल  के 35 बच्चों को स्कूल डे्रस बांटी गई। 
जहां बच्चों ने खुशी व्यक्त कर भगवान से सभी की खुशहाली की कामना की। इस मौके पर सुन्दरकाण्ड के पाठ भी किए गए।
इसी तरहा भूरासिद्ध हनुमान मंदिर पुराना व नए में भी अनेक धार्मिक आयोजन हुए। जहां भण्डारे का भी आयोजन हुआ। महल चौक हजूरी गेट स्थित श्रीश्री 1008 डंडे वाले हनुमान मंदिर पर भी दिनभर श्रद्धालुओं ने हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड के पाठ किए। प्रसाद चढ़ाकर  मन्नत मांगी।         
 

पर्युषण पर्व : मोक्ष का साक्षात उपाय है मैं छोड़कर दूसरों को क्षमा करना : विद्यासागर जी महाराज

जयपुर टाइम्स
जयपुर (कासं)। पर्युषण पर्व मोह की नींद में सोए लोगों के लिए सबक लेकर आया है। इन दिनों संसार के मूल कारण- आठ कर्म छूट जाते हैं। कहा भी है- पर्वराज यह आ गया, चला जाएगा काल। परंतु कुछ भी ना मिला, टेढ़ी हमारी चाल॥ 
हमारी चाल टेढ़ी है, पर्वराज न आता है, न जाता है। हम चले जा रहे हैं। हमें सांसारिक संबंधों से छुट्टी लेनी है, परिश्रम से नहीं। आचार्यों ने वस्तु के स्वभाव को धर्म बताया है। दस प्रकार के क्षमादि भावों को धर्म कहते हैं। धर्म, अधर्म, आकाश और काल भी वस्तु है। सभी का अपना स्वभाव ही उनका धर्म है। तो आज हम कौन से धर्म का पालन करें, जिससे कल्याण हो। स्वभाव तो हमेशा धर्म रहेगा ही, लेकिन इस स्वभाव की प्राप्ति के लिए जो किया जाने वाला धर्म है वह है- 'खमादिभावो या दसविहो धम्मोÓ- क्षमादि भाव रूप दस प्रकार का धर्म आज से शुरू हो रहा है। क्षमा धर्म के लिए आज का दिन तय है। क्षमा धर्म की बड़ी महत्ता बताई गई है। करोड़ नारियल चढ़ाने में जितना फल मिलता है, उतना फल एक स्तुति से मिलता है और करोड़ स्तुति का फल एक बार जाप से मिलता है। जितना फल करोड़ जाप से मिलता है, उतना एक बार मन-वचन-काय को एकाग्रकर ध्यान से मिलता है। शारीरिक-वाचनिक-मानसिक क्रिया जितनी निर्मल होती जाती है, उतना फल मिलता जाता है। कोटि बार ध्यान से जो फल मिलता है, वह एक क्षमा से मिलता है। क्षमा से बैर नहीं रखना है। मोक्ष का साक्षात उपाय क्षमा है। आप आधि-व्याधि से तो दूर हो सकते हैं, पर उपाधि से दूर होना मुश्किल है, 'मैंÓ पना नहीं निकलता। आधि मानसिक चिन्ता को कहते हैं और व्याधि शारीरिक बीमारी है। 
उपाधि बौद्धिक विकार है। समाधि आध्यात्मिक है। क्षमा करने वाले अनंतचतुष्टय का अनुभव करते हैं। पर घाति चतुष्टय का क्या? वहां सुख अनंत है, यहां दुख अनंत है। आत्मा के अहित का कारण कषाय यानी राग-द्वेष जैसे अवगुण हैं। इन्हें हटाने पर ही क्षमा की सच्ची भावना आ पाएगी।     

हैदराबाद में 1 करोड़ से बनी भगवान गणेश की 61 फीट ऊंची और 50 टन वजनी मूर्ति

1954 से हर साल हैदराबाद के खैरताबाद में सबसे ऊंचे गणपति विराजित हो रहे
इस साल बारह मुखी द्वादशादित्य महागणपति विराजेंगे
देश में गणेशोत्सव में स्थापित होने वाली मूर्तियों में यह सबसे बड़ी होगी, क्रेन की मदद से विसर्जन किया जाएगा
जयपुर टाइम्स
हैदराबाद (एजेंसी)। सोमवार से गणेशोत्सव शुरू हो रहा है। हैदराबाद के खैरताबाद में गणपति की 61 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित की जाएगी। करीब 1 करोड़ रुपए की लागत से बनी यह मूर्ति 12 मुखी है। इसे श्री द्वादशादित्य महागणपति नाम दिया गया है। यहां 1954 से लगातार हर साल गणेशजी की विशाल मूर्ति स्थापित की जाती है। गणेश उत्सव के दौरान यहां स्थापित की जाने वाली मूर्ति देशभर में सबसे ऊंची होती है। सी. राजेंद्रन, वेंकट गुव्वाला और उनकी टीम के 150 सदस्यों ने हैदराबाद में यह मूर्ति बनाई। इसे बनाने की शुरुआत मई में हुई। इसमें तीन महीने से ज्यादा समय लगा। इसका वजन करीब 50 टन है। इसे पीओपी की मदद से बनाया गया है। यह देश की सबसे ऊंची बारह मुखी गणेश प्रतिमा है, जो गणेश उत्सव के दौरान स्थापित की जाएगी। इस साल गणेशजी की मूर्ति सूर्यदेव के 12 स्वरूपों से प्रेरित है।
खैरताबाद गणेश उत्सव समिति के ज्वाइंट सेक्रेटरी संदीप राज के अनुसार, उत्सव समिति का गठन 1954 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एस. शंकरय्या ने किया था। तब से हर साल यहां गणेश की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है। एस. शंकरय्या के बाद उनके भाई एस. सुदर्शन के साथ एस. राजकुमार और उनका परिवार गणेश उत्सव का आयोजन करता है। अब तक यहां स्थापित की गई मूर्तियों की औसत ऊंचाई 60 फीट रही है। 
गणेश उत्सव के दौरान इतनी ऊंची प्रतिमा कहीं और विराजमान नहीं की जाती। 

हैदराबाद में 1 करोड़ से बनी भगवान गणेश की 61 फीट ऊंची और 50 टन वजनी मूर्ति

1954 से हर साल हैदराबाद के खैरताबाद में सबसे ऊंचे गणपति विराजित हो रहे
इस साल बारह मुखी द्वादशादित्य महागणपति विराजेंगे
देश में गणेशोत्सव में स्थापित होने वाली मूर्तियों में यह सबसे बड़ी होगी, क्रेन की मदद से विसर्जन किया जाएगा
जयपुर टाइम्स
हैदराबाद (एजेंसी)। सोमवार से गणेशोत्सव शुरू हो रहा है। हैदराबाद के खैरताबाद में गणपति की 61 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित की जाएगी। करीब 1 करोड़ रुपए की लागत से बनी यह मूर्ति 12 मुखी है। इसे श्री द्वादशादित्य महागणपति नाम दिया गया है। यहां 1954 से लगातार हर साल गणेशजी की विशाल मूर्ति स्थापित की जाती है। गणेश उत्सव के दौरान यहां स्थापित की जाने वाली मूर्ति देशभर में सबसे ऊंची होती है। सी. राजेंद्रन, वेंकट गुव्वाला और उनकी टीम के 150 सदस्यों ने हैदराबाद में यह मूर्ति बनाई। इसे बनाने की शुरुआत मई में हुई। इसमें तीन महीने से ज्यादा समय लगा। इसका वजन करीब 50 टन है। इसे पीओपी की मदद से बनाया गया है। यह देश की सबसे ऊंची बारह मुखी गणेश प्रतिमा है, जो गणेश उत्सव के दौरान स्थापित की जाएगी। इस साल गणेशजी की मूर्ति सूर्यदेव के 12 स्वरूपों से प्रेरित है।
खैरताबाद गणेश उत्सव समिति के ज्वाइंट सेक्रेटरी संदीप राज के अनुसार, उत्सव समिति का गठन 1954 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एस. शंकरय्या ने किया था। 


तब से हर साल यहां गणेश की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है। एस. शंकरय्या के बाद उनके भाई एस. सुदर्शन के साथ एस. राजकुमार और उनका परिवार गणेश उत्सव का आयोजन करता है। अब तक यहां स्थापित की गई मूर्तियों की औसत ऊंचाई 60 फीट रही है। गणेश उत्सव के दौरान इतनी ऊंची प्रतिमा कहीं और विराजमान नहीं की जाती। 

बिना आधार के पशुपतिनाथ मंदिर में नहीं मिलेगा भंडारा खाने का मौका, प्रशासन का आदेश

जयपुर टाइम्स
भोपाल (एजेंसी)। मध्यप्रदेश के मंदसौर में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में अब बिना आधार कार्ड के भंडारा खाने का मौका नहीं मिलेगा। मंदिर प्रशासन ने ऐसा गैर जरुरी लोगों को भंडारे से दूर रखने के लिए किया है। भंडारे के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करने वाला यद देश का पहला मंदिर बन गया है।
मंदसौर कलेक्टर मनोज पुष्प के आदेश पर बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर प्रशासन ने हाल में रोजाना भंडारे की व्यवस्था की थी। 1500 साल पुरानी अष्टमुखी प्रतिमा के दर्शन के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदसौर पहुंचते हैं। वहीं सावन में इनकी तादात अन्य महीनों की अपेक्षा तीन गुनी से भी ज्यादा बढ़ जाती है।
मंदिर प्रशासन समिति के अनुसार भंडारे में रोजाना 300 लोगों के लिए भोजन बनाया जा रहा है जो डेढ़ घंटे में ही समाप्त हो जा रहा है। इसका फायदा दूर से आए श्रद्धालुओं को नहीं मिल पा रहा है। 
प्रशासन के अनुसार, भंडारे में भोजन करने के लिए स्थानीय लोग बड़ी संख्या में आते हैं जिससे दूर से आए श्रद्धालुओं को भोजन नहीं मिल पा रहा है। इसलिए आधार कार्ड से दूर से आए श्रद्धालु पहले भोजन कर सकेंगे। जिसके पास आधार नहीं होगा वह अपने किसी साथी के आधार कार्ड से भोजन प्राप्त कर सकता है। 

17 दिसंबर को शनि होगा अस्त

शनि की साढ़े साती से परेशान लोगों को इस महीने राहत मिल सकती है। शनि के पिता सूर्य 16 दिसंबर को धनु राशि में प्रवेश करेंगे और पुत्र शनि से मिलेंगे। सूर्य और शनि के मिलन के चलते शनि 17 दिसंबर को अस्त हो जाएगा और एक माह तक यही स्थिति बनी रहेगी। इसके चलते शनि की साढ़े साती और अढ़ैया से परेशान चल रहे जातकों को राहत मिलेगी। 
शनिदेव के प्रकोप से बचना है तो करें ये 5 आसान उपाय, कष्टों से मिल जाएगी मुक्ति
ज्योतिषविद जगदीश सोनी ने बताया कि इन दिनों शनि पहले से ही धनु राशि में विचरण कर रहा है। 16 को सूर्य भी इस राशि में प्रवेश कर जाएगा। शनि और सूर्य का आमने-सामने आना ज्योतिष में अशुभ माना जाता है और सूर्य के धनु में प्रवेश के साथ ही धनु मलमास लग जाएगा। इसके साथ ही एक माह के लिए विवाह जैसे शुभ कार्य भी रुक जाएंगे। लगभग एक माह इस राशि में रहने के बाद सूर्य 14 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करेगा, 17 जनवरी से शुभ कार्य दोबारा शुरू हो जाएंगे। 
न्याय के देवता अपने भक्तों पर बरसाते हैं कृपा
शनि अस्त होने पांच राशियों को मिलेगा लाभ
ज्योतिषी की मानें तो सूर्य के धनु राशि में आने से कर्क, तुला और कुंभ राशि के जातकों के लिए एक माह का समय शुभ रहेगा। इन तीनों राशि वालों के अटके हुए कार्य बन सकते हैं। आर्थिक समस्या का समाधान हो सकता है। हालांकि सूर्य शनि का मिलन पितृदोष नामक अशुभ योग भी बनाता है। जिन लोगों की जन्मकुण्डली में सूर्य-शनि की युति धनु राशि में है उनके लिए ये समय अशुभ रह सकता है। उन्हें लगभग एक माह तक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा। शनि ग्रह 17 दिसम्बर 2018 से लगभग एक माह तक अस्त रहेगा। वर्तमान गोचर के अनुसार वृश्चिक, धनु और मकर राशि पर शनि की साढ़ेसती और वृष एवं कन्या पर शनि की अढैया चल रही है। ये पांचों राशियां शनि ग्रह के अस्त होने से लाभान्वित होंगी।

आज है कार्तिक पूर्णिमा, यहां पढ़ें व्रत कथा

कार्तिक पूर्णिमा को कई जगह देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली के त्रिपुरों का नाश किया था। त्रिपुरों का नाश करने के कारण ही भगवान शिव का एक नाम त्रिपुरारी भी प्रसिद्ध है। इस दिन गंगा-स्नान व दीपदान का विशेष महत्व है। इसी पूर्णिमा के भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। कई तीर्थ स्थानों में इसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा

दैत्य तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली। जब भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो उसके पुत्रों को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने देवताओं से बदला लेने के लिए घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। जब ब्रह्माजी प्रकट हुए तो उन्होंने अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने के लिए कहा।
 
तब उन तीनों ने ब्रह्माजी से कहा कि- आप हमारे लिए तीन नगरों का निर्माण करवाईए। हम इन नगरों में बैठकर सारी पृथ्वी पर आकाश मार्ग से घूमते रहें। एक हजार साल बाद हम एक जगह मिलें। उस समय जब हमारे तीनों पुर (नगर) मिलकर एक हो जाएं, तो जो देवता उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सके, वही हमारी मृत्यु का कारण हो। ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया।

आज यानी 23 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा है. पूर्णिमा तिथि पूर्णत्व की तिथि मानी जाती है. इस तिथि के स्वामी स्वयं चन्द्रदेव हैं. इस तिथि को चन्द्रमा सम्पूर्ण होता है. सूर्य और चन्द्रमा समसप्तक होते हैं.

इस तिथि पर जल और वातावरण में विशेष उर्जा आ जाती है. इसीलिए नदियों और सरोवरों में स्नान किया जाता है. कार्तिक की पूर्णिमा इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस दिन नौ ग्रहों की कृपा आसानी से पायी जा सकती है. इस दिन स्नान,दान और ध्यान विशेष फलदायी होता है.

सिख धर्म के लिए भी है बड़ा महत्व-

कार्तिक पूर्ण‍िमा का महत्व सिख धर्म में भी बहुत है. माना जाता है कि इस दिन सिखों के पहले गुरु, गुरुनानक देव जी का जन्म हुआ था. इस दिवस को सिख धर्म में प्रकाशोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है. इसे गुरु नानक जयंती भी कहते हैं. गुरु नानक जयंती पर गुरुद्वारों में खास पाठ का आयोजन होता है. सुबह से शाम तक की‍र्तन चलता है और गुरुद्वारों के साथ ही घरों में भी खूब रोशनी की जाती है. इसके अलावा, लंगर छकने के लिए भी भीड़ उमड़ती है.

इस बार की पूर्णिमा की ख़ास बातें क्या हैं ?

- कृत्तिका नक्षत्र में चन्द्रमा की उपस्थिति होगी.

- बृहस्पति और चन्द्रमा का गजकेसरी योग भी होगा.

- बुध और बृहस्पति का संयोग भी बना रहेगा.

- कार्तिक की पूर्णिमा को स्नान और दीपदान करने से पापों का प्रायश्चित भी होगा.

- इस समय स्नान से पुण्य के अलावा अमृत तत्व भी मिल सकता है.

किस प्रकार करें आज स्नान?

- प्रातः काल स्नान के पूर्व संकल्प लें.

- फिर नियम और तरीके से स्नान करें.

- स्नान करने के बाद सूर्य को अर्घ्य दें.

- साफ़ वस्त्र या सफ़ेद वस्त्र धारण करें और फिर मंत्र जाप करें.

- मंत्र जाप के पश्चात अपनी आवश्यकतानुसार दान करें.

- चाहें तो इस दिन जल और फल ग्रहण करके उपवास रख सकते हैं.

नौ ग्रहों के लिए किस प्रकार नौ दान करें?

- सूर्य के कारण ह्रदय रोग और अपयश की समस्या होती है-

- इसके निवारण के लिए गुड़ और गेंहू का दान करें.

- चन्द्रमा के कारण मानसिक रोग और तनाव के योग बनते हैं-

- इससे बचने के लिए जल, मिसरी या दूध का दान करें.

- मंगल के कारण रक्त दोष और मुकदमेबाजी की समस्या होती है.

- इससे बचने के लिए मसूर की दाल का दान करें.

- बुध के कारण त्वचा और बुद्धि की समस्या हो जाती है-

- इसके निवारण के लिए हरी सब्जियों और आंवले का दान करना चाहिए.

- बृहस्पति के कारण मोटापा, पाचन तंत्र और लिवर की समस्या हो जाती है-

- इसके निवारण के लिए केला, मक्का और चने की दाल का दान करें.

- शुक्र के कारण मधुमेह और आंखों की समस्या होती है-

- इसके निवारण के लिए घी, मक्खन और सफ़ेद तिल आदि का दान करना चाहिए.

- शनि के कारण स्नायु तंत्र और लम्बी बीमारियां हो जाती हैं-

- इसके निवारण के लिए काले तिल और सरसों के तेल का दान करना चाहिए.

- राहु - केतु के कारण विचित्र तरह के रोग हो जाते हैं.

- इसके निवारण के लिए सात तरह के अनाज, काले कम्बल और जूते चप्पल का दान