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17 दिसंबर को शनि होगा अस्त

शनि की साढ़े साती से परेशान लोगों को इस महीने राहत मिल सकती है। शनि के पिता सूर्य 16 दिसंबर को धनु राशि में प्रवेश करेंगे और पुत्र शनि से मिलेंगे। सूर्य और शनि के मिलन के चलते शनि 17 दिसंबर को अस्त हो जाएगा और एक माह तक यही स्थिति बनी रहेगी। इसके चलते शनि की साढ़े साती और अढ़ैया से परेशान चल रहे जातकों को राहत मिलेगी। 
शनिदेव के प्रकोप से बचना है तो करें ये 5 आसान उपाय, कष्टों से मिल जाएगी मुक्ति
ज्योतिषविद जगदीश सोनी ने बताया कि इन दिनों शनि पहले से ही धनु राशि में विचरण कर रहा है। 16 को सूर्य भी इस राशि में प्रवेश कर जाएगा। शनि और सूर्य का आमने-सामने आना ज्योतिष में अशुभ माना जाता है और सूर्य के धनु में प्रवेश के साथ ही धनु मलमास लग जाएगा। इसके साथ ही एक माह के लिए विवाह जैसे शुभ कार्य भी रुक जाएंगे। लगभग एक माह इस राशि में रहने के बाद सूर्य 14 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करेगा, 17 जनवरी से शुभ कार्य दोबारा शुरू हो जाएंगे। 
न्याय के देवता अपने भक्तों पर बरसाते हैं कृपा
शनि अस्त होने पांच राशियों को मिलेगा लाभ
ज्योतिषी की मानें तो सूर्य के धनु राशि में आने से कर्क, तुला और कुंभ राशि के जातकों के लिए एक माह का समय शुभ रहेगा। इन तीनों राशि वालों के अटके हुए कार्य बन सकते हैं। आर्थिक समस्या का समाधान हो सकता है। हालांकि सूर्य शनि का मिलन पितृदोष नामक अशुभ योग भी बनाता है। जिन लोगों की जन्मकुण्डली में सूर्य-शनि की युति धनु राशि में है उनके लिए ये समय अशुभ रह सकता है। उन्हें लगभग एक माह तक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा। शनि ग्रह 17 दिसम्बर 2018 से लगभग एक माह तक अस्त रहेगा। वर्तमान गोचर के अनुसार वृश्चिक, धनु और मकर राशि पर शनि की साढ़ेसती और वृष एवं कन्या पर शनि की अढैया चल रही है। ये पांचों राशियां शनि ग्रह के अस्त होने से लाभान्वित होंगी।


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आज है कार्तिक पूर्णिमा, यहां पढ़ें व्रत कथा

कार्तिक पूर्णिमा को कई जगह देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली के त्रिपुरों का नाश किया था। त्रिपुरों का नाश करने के कारण ही भगवान शिव का एक नाम त्रिपुरारी भी प्रसिद्ध है। इस दिन गंगा-स्नान व दीपदान का विशेष महत्व है। इसी पूर्णिमा के भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। कई तीर्थ स्थानों में इसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा

दैत्य तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली। जब भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो उसके पुत्रों को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने देवताओं से बदला लेने के लिए घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। जब ब्रह्माजी प्रकट हुए तो उन्होंने अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने के लिए कहा।
 
तब उन तीनों ने ब्रह्माजी से कहा कि- आप हमारे लिए तीन नगरों का निर्माण करवाईए। हम इन नगरों में बैठकर सारी पृथ्वी पर आकाश मार्ग से घूमते रहें। एक हजार साल बाद हम एक जगह मिलें। उस समय जब हमारे तीनों पुर (नगर) मिलकर एक हो जाएं, तो जो देवता उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सके, वही हमारी मृत्यु का कारण हो। ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया।

आज यानी 23 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा है. पूर्णिमा तिथि पूर्णत्व की तिथि मानी जाती है. इस तिथि के स्वामी स्वयं चन्द्रदेव हैं. इस तिथि को चन्द्रमा सम्पूर्ण होता है. सूर्य और चन्द्रमा समसप्तक होते हैं.

इस तिथि पर जल और वातावरण में विशेष उर्जा आ जाती है. इसीलिए नदियों और सरोवरों में स्नान किया जाता है. कार्तिक की पूर्णिमा इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस दिन नौ ग्रहों की कृपा आसानी से पायी जा सकती है. इस दिन स्नान,दान और ध्यान विशेष फलदायी होता है.

सिख धर्म के लिए भी है बड़ा महत्व-

कार्तिक पूर्ण‍िमा का महत्व सिख धर्म में भी बहुत है. माना जाता है कि इस दिन सिखों के पहले गुरु, गुरुनानक देव जी का जन्म हुआ था. इस दिवस को सिख धर्म में प्रकाशोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है. इसे गुरु नानक जयंती भी कहते हैं. गुरु नानक जयंती पर गुरुद्वारों में खास पाठ का आयोजन होता है. सुबह से शाम तक की‍र्तन चलता है और गुरुद्वारों के साथ ही घरों में भी खूब रोशनी की जाती है. इसके अलावा, लंगर छकने के लिए भी भीड़ उमड़ती है.

इस बार की पूर्णिमा की ख़ास बातें क्या हैं ?

- कृत्तिका नक्षत्र में चन्द्रमा की उपस्थिति होगी.

- बृहस्पति और चन्द्रमा का गजकेसरी योग भी होगा.

- बुध और बृहस्पति का संयोग भी बना रहेगा.

- कार्तिक की पूर्णिमा को स्नान और दीपदान करने से पापों का प्रायश्चित भी होगा.

- इस समय स्नान से पुण्य के अलावा अमृत तत्व भी मिल सकता है.

किस प्रकार करें आज स्नान?

- प्रातः काल स्नान के पूर्व संकल्प लें.

- फिर नियम और तरीके से स्नान करें.

- स्नान करने के बाद सूर्य को अर्घ्य दें.

- साफ़ वस्त्र या सफ़ेद वस्त्र धारण करें और फिर मंत्र जाप करें.

- मंत्र जाप के पश्चात अपनी आवश्यकतानुसार दान करें.

- चाहें तो इस दिन जल और फल ग्रहण करके उपवास रख सकते हैं.

नौ ग्रहों के लिए किस प्रकार नौ दान करें?

- सूर्य के कारण ह्रदय रोग और अपयश की समस्या होती है-

- इसके निवारण के लिए गुड़ और गेंहू का दान करें.

- चन्द्रमा के कारण मानसिक रोग और तनाव के योग बनते हैं-

- इससे बचने के लिए जल, मिसरी या दूध का दान करें.

- मंगल के कारण रक्त दोष और मुकदमेबाजी की समस्या होती है.

- इससे बचने के लिए मसूर की दाल का दान करें.

- बुध के कारण त्वचा और बुद्धि की समस्या हो जाती है-

- इसके निवारण के लिए हरी सब्जियों और आंवले का दान करना चाहिए.

- बृहस्पति के कारण मोटापा, पाचन तंत्र और लिवर की समस्या हो जाती है-

- इसके निवारण के लिए केला, मक्का और चने की दाल का दान करें.

- शुक्र के कारण मधुमेह और आंखों की समस्या होती है-

- इसके निवारण के लिए घी, मक्खन और सफ़ेद तिल आदि का दान करना चाहिए.

- शनि के कारण स्नायु तंत्र और लम्बी बीमारियां हो जाती हैं-

- इसके निवारण के लिए काले तिल और सरसों के तेल का दान करना चाहिए.

- राहु - केतु के कारण विचित्र तरह के रोग हो जाते हैं.

- इसके निवारण के लिए सात तरह के अनाज, काले कम्बल और जूते चप्पल का दान 


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कार्य में सफलता के लिए जपें ये मंत्र

अक्‍सर वाहनों पर भगवान राम का एक मंत्र ल‍िखा देता है। यह मंत्र वाहन से यात्रा करते समय आपकी सुरक्षा की गारंटी देता है। जब भी घर से बाहर जाएं, तो इस मंत्र का जप जरूर करें, यकीन मान‍िए आपकी सुरक्ष‍ित गंतव्‍य तक पहुंचेंगे। 

मंत्र-
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। 
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ 

इस मंत्र का अर्थ है- अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है। भगवान राम का ये मंत्र क‍िसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है। 

इतना ही नहीं जब आप किसी विशेष कार्य के लिए कहीं जाते हैं तो आपके मन में यह शंका अवश्य रहती हैं कि अमुक कार्य में सफलता मिलेगी या नहीं। कार्य में सफलता मिलने में कहीं कोई बाधा तो नहीं होगी। इसके शंका के निवारण के लिए तथा कार्य में सफलता पाने के लिए नीचे लिखे मंत्र का जप करें तो सभी प्रकार की बाधाओं का नाश हो जाता है और कार्य में सफलता अवश्य मिलती है।  

मंत्र-
राम लक्ष्मणौ सीता च सुग्रीवों हनुमान कपि।
पञ्चैतान स्मरतौ नित्यं महाबाधा प्रमुच्यते।।

जब भी आप घर से किसी विशेष कार्य के लिए बाहर निकलें तो सबसे पहले भगवान श्रीराम के चित्र के समक्ष इस मंत्र का जप मन ही मन में करें। उसके बाद घर से निकलें तो आपके कार्य में कोई बाधा नहीं आएगी और कार्य में सफलता भी मिलेगी।


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धनतेरस के दिन क्‍यों जलाया जाता है दीया, जानें सम्‍पूर्ण विधि

 धनतेरस से दीपावली का पर्व शुरू हो जाता है। इस दिन धन के देवता कुबेर और देवताओं के चिकित्सक धन्वंतरि महाराज की पूजा होती है। धनतेरस पर दीप जलाना क्यों जरूरी होता है और इसे कैसे जलाया जाता है ये जानना जरूरी है।

इस त्योहार की सबसे बड़ी मान्यता यह है कि इस दिन की गई पूजा से व्यक्ति यम के द्वारा दी जानें वाली यातनाओं से मुक्त हो जाता है। हिन्दू धर्म में धनतेरस यश और वैभव, कीर्ति सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। धनतेरस की शाम को दीप दान किया जाता है और माना जाता है कि ऐसा करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और इससे व्यक्ति की अकाल मृत्यु नहीं होती हैं। लेकिन इस दिन दीप जलाने का तरीका आम दिनों से अलग होता है। तो आइए जाने इसे जलाने के तरीके। 

यम का दिया कैसे जलाये
वैसे तो धनतेरस की शाम को मुख्य द्वार पर 13 और घर के अंदर भी 13 दीप जलाने होते हैं। ये काम सूरज डूबने के बाद किया जाता है। लेकिन यम का दीया परिवार के सभी सदस्यों के घर आने और खाने-पीने के बाद सोते समय जलाया जाता है। इस दीप को जलाने के लिए पुराने दीप का इस्‍तेमाल करें। उसमें सरसों का तेल डालें और रुई की बत्ती बनाएं। घर से दीप जलाकर लाएं और घर से बाहर उसे दक्षिण की ओर मुख कर नाली या कूड़े के ढेर के पास रख दें। साथ में जल भी चढ़ाएं और बिना उस दीप को देखे घर आ जाएं।

धनतेरस (Dhanteras) के दिन ऐसे करें पूजा
धनतेरस का दीपदान घर की लक्ष्मी को करना चाहिए। इस दिन किसी भी धातु के बर्तन खरीदें और उसमें मिठाई भर कर ही घर मे प्रवेश करें और धनवंतरी, कुबेर और लक्ष्मी गणेश को भोग लगाएं।इससे घर के लोग रोग, विपदाओं और द्ररिद्रता से दूर रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि सोने-चांदी या पीतल के बर्तन खरीदने से घर में सौभाग्य, सुख-शांति और स्वास्थ्य का वास होता है। पीतल भगवान धन्वंतरी का धातु है। इसलिए पीले रंग के धातु इस दिन खरीदना शुभ होता है।

 

 


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सिकंदर ने कहा था, अर्थी पर मेरे हाथ लटकाते हुए लेकर जाना

ओशो

 

सुना है, सिकंदर मरा और जिस राजधानी में मरा, उसकी अरथी निकाली गई तो मरने के पहले उसने अपने मित्रों से कहा, मेरे दोनों हाथ अरथी के बाहर लटके रहने देना। मित्रों ने कहा - 'पागल हो गए हैं आप? अरथी के भीतर हाथ होते हैं सदा, बाहर नहीं होते।"

सिकंदर ने कहा - 'मेरी इतनी इच्छा पूरी कर देना हालांकि जीवन में मेरी कोई इच्छा पूरी नहीं हो पाई है। मर कर तुम कम से कम मेरी इतनी इच्छा पूरी कर देना कि मेरे दोनों हाथ बाहर लटके रहने देना।"

मरे हुए आदमी की इच्छा पूरी करनी पड़ी। उसके दोनों हाथ बाहर लटके हुए थे। जब उसकी अरथी निकली तो लाखों लोग देखने आए थे। हर आदमी यही पूछने लगा कि अरथी के बाहर हाथ क्यों लटके हैं? कोई भूल-चूक हो गई है। हर आदमी यही पूछ रहा था। सांझ होते-होते लोगों को पता चला, भूल नहीं हुई है। सिकंदर ने मरने के पहले कहा था कि मेरा हाथ बाहर लटके रहने देना। जब मित्रों ने पूछा था क्क 'क्यों?" 

तो सिकंदर ने कहा था - 'मैं लोगों को दिखा देना चाहता हूं कि मैं भी खाली हाथ जा रहा हूं। जो पाने की कोशिश की थी, वह नहीं पा सका हूं। मेरे दोनों हाथ खाली हैं, यह लोग देख लें।"

शायद इसीलिए हम हाथों को अरथी के भीतर छिपाते हैं ताकि पता न चल जाए कि हाथ खाली हैं। जिंदगी भर दौड़ते हैं और कहीं नहीं पहुंचते हैं। हां, दिल्ली पहुंच सकते हैं। लेकिन वहां पहुंच कर भी कहीं नहीं पहुंचते हैं। पहुंचना नहीं हो पाता। क्योंकि जिस चीज की तलाश में चलता है आदमी आनंद की तलाश में, वह कहीं भी पहुंच कर नहीं मिलता। वह तो उस आदमी को मिलता है जो पहुंचने की दौड़ छोड़ देता है। क्यों? क्योंकि आनंद आदमी के भीतर है, बाहर नहीं। अगर बाहर होता तो हम दौड़ कर पहुंच जाते और पा लेते। अगर मुझे तुम्हारे पास आना हो तो चलना पड़ेगा। लेकिन अगर मुझे मेरे ही पास जाना हो तो चलने की कोई जरूरत नहीं है। अगर मुझे दूर पहुंचना हो तो यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन अगर मुझे पास ही पहुंचना हो तो कम ही यात्रा करनी पड़ेगी और अगर मुझे वहीं पहुंचना हो जहां मैं हूं, तब तो यात्रा करनी ही नहीं पड़ेगी।

एक बहुत बुनियादी भ्रम है कि आनंद कहीं पहुंचने पर मिलेगा। सारी शिक्षा उस भ्रम को पैदा करती है। वह कहती है, फलां जगह पहुंच जाओ तो आनंदित हो सकते हो।

यही है प्रमाण-पत्र मिल जाने पर आनंद मिल जाएगा। प्रमाण-पत्र मिल जाते हैं, आनंद नहीं मिलता। तब हाथ में कागज का बोझ घबराने वाला हो जाता है। और तब यह लगता है कि आनंद तो नहीं मिला, लेकिन हम आदमी को दौड़ाते रहते हैं। प्राइमरी में पढ़ता है तो उससे कहते हैं हाईस्कूल में। हाईस्कूल में पढ़ता है तो कहते हैं लक्ष्य है यूनिवर्सिटी में। यूनिवर्सिटी के बाहर निकलता है तो हम कहते हैं, अब जिंदगी में, शादी में, विवाह में। और सब कहानियां, सब उपन्यास और सब फिल्में जहां शादी विवाह हुए, वहीं द एण्ड आ जाता है। उधर से हम कह देते हैं, बस। सब कहानियां पढ़ें तो एक बड़ी मजेदार बात है। उन कहानियों में लिखा है, उन दोनों की शादी हो गई, फिर वे दोनों सुख से रहने लगे, हालांकि ऐसा होता नहीं। इसके बाद कहानी नहीं चलती है, क्योंकि इसके बाद कहानी बहुत खतरनाक है। कहानी यहां पूरी हो जाती है।

नहीं, न तो शिक्षित होने से आनंद मिल पाता, न तो विवाह से आनंद मिल पाता है, न संपत्ति से आनंद मिल पाता है, न पद-प्रतिष्ठा से आनंद मिल पाता। काश! दुनिया के सब वे लोग जो बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं, ईमानदारी से कह सकें तो वे कह सकेंगे कि कुछ भी नहीं मिला। वे सारे लोग, जो बहुत धन इकट्ठा कर लेते हैं, अगर ईमानदार हों और लोगों को कह दें, शायद वे कहेंगे, धन तो मिल गया, लेकिन और कुछ भी नहीं मिला। लेकिन इतनी कहने की हिम्मत भी नहीं जुटाते। उसका कारण है। कारण यह है, जो आदमी जिंदगी भर दौड़ा हो और जब उसने उस चीज को पा लिया हो, जिसके लिए दौड़ा है। अब अगर वह लोगों से कहे कि पा तो लिया, लेकिन कुछ भी नहीं मिला तो लोग कहेंगे कि तुम व्यर्थ ही दौड़े, तुम्हारा जीवन बेकार हो गया। अब वह अपने अहंकार को बचाने की कोशिश करता है। भीतर तो जान लेता है कि कुछ भी नहीं मिला। बाहर स्वीकार न करके वह अपने व्यर्थ दौड़ने को बचा ले जाता है।


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16 दिन का होता है श्राद्धपक्ष, यदि तिथि नहीं पता हो, तो जानिए कब करें श्राद्ध

मल्टीमीडिया डेस्क। 24 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं। पितृ पक्ष भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी से आरम्भ होकर आश्विन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि तक चलेगा। पितरों को भोजन और अपनी श्रद्धा पहुंचाने का एकमात्र साधन श्राद्ध है।

आमतौर पर श्राद्ध 16 दिन के ही होते हैं, लेकिन कभी-कभार एक ही दिन दो तिथियां पड़ने से इनकी संख्या घट-बढ़ सकती है। पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक कुल मिलाकर 16 तिथियां होती हैं। हर व्यक्ति की मृत्यु इन्हीं 16 तिथियों में से किसी एक तिथि को होती है।

लिहाजा, जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु होती है, उसी के अनुसार उसके परिजन श्राद्ध करते हैं। मृतक के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिंड तथा दान ही श्राद्ध कहा जाता है। अगर किसी को अपने परिजन की मृत्यु की तिथि नहीं पता हो, तो उनके लिए श्राद्ध अमावस्या तिथि को करना चाहिए।

पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध कई तरह के होते हैं। भविष्य पुराण में श्राद्ध के 12 प्रकार के बारे में बताया गया है। ये हैं नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सपिंडन, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धयर्थ, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ और पुष्टयर्थ।

नित्य श्राद्ध- पितृपक्ष के पूरे दिनों में हर रोज जल, अन्न, दूध और कुश से श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। इसे नित्य श्राद्ध कहा जाता है।

नैमित्तिक श्राद्ध- माता-पिता की मृत्यु के दिन यह श्राद्ध किया जाता है। इसे एकोदिष्ट कहा जाता है।

काम्य श्राद्ध- यह श्राद्ध विशेष सिद्धि को हासिल करने के लिए किया जाता है।

वृद्धि श्राद्ध- सौभाग्य और सुख में कामना कामने के लिए वृद्धि श्राद्ध किया जाता है।

सपिंडन श्राद्ध- यह श्राद्ध मृत व्यक्ति के 12वें दिन किया जाता है। इसे महिलाएं भी कर सकती है।

पार्वण श्राद्ध- यह श्राद्ध को पर्व की तिथि पर किया जाता है। इसलिए इसे पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।

गोष्ठी श्राद्ध- जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर श्राद्ध करते हैं, तो उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं।

शुद्धयर्थ श्राद्ध- परिवार की शुद्धता के लिए इसे किया जाता है।

कर्मांग श्राद्ध- किसी संस्कार के मौके पर किया जाता है।

 

तीर्थ श्राद्ध- किसी तीर्थ पर जाकर किए जाने वाला श्राद्ध तीर्थ श्राद्ध कहते हैं।

यात्रार्थ श्राद्ध- यात्रा की सफलता के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को याश्रार्थ श्राद्ध कहते हैं।

 

पुष्टयर्थ श्राद्ध- आर्थिक उन्ननि के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को पुष्टयर्थ कहते हैं।


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आज से पितृ पक्ष की शुरुआत, इन मुहूर्त में होगा पितरों का तर्पण

लखनऊ। भादो में आज पूर्णिमा तिथि के साथ ही श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ हो जाएगा। सोलह दिन के लिए हमारे पितृ घर में विराजमान होंगे। इस दौरान अपने वंश का कल्याण करेंगे।

घर में सुख-शांति-समृद्धि प्रदान करेंगे। जिनकी कुंडली में पितृ दोष हो, उनको अवश्य अर्पण-तर्पण करना चाहिए। वैसे तो सभी के लिए अनिवार्य है कि वे श्राद्ध करें। श्राद्ध करने से हमारे पितृ तृप्त होते हैं। सोमवार को पूर्णिमा है। जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई है, वे सवेरे तर्पण करें और मध्याह्न को भोजनांश निकालकर अपने पितरों को याद करें। 

पूर्णिमा का श्राद्ध

सोमवार को प्रात: 7.17 बजे से पूर्णिमा का प्रारम्भ हो जाएगा। इसके बाद आप पूर्णिमा का श्राद्ध कर सकते हैं। अश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष को समर्पित है। इन 16 दिन में हमारे पूर्वज हमारे घरों पर आते हैं और तर्पण मात्र से ही तृप्त होते हैं। श्राद्ध पक्ष का प्रारम्भ भाद्रपद मास की पूर्णिमा से होता है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष के समय सूर्य कन्या राशि में स्थित होता है। सूर्य के कन्यागत होने से ही इन 16 दिनों को कनागत कहते हैं। पितरों के प्रति तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन ही श्राद्ध कहलाता है। देव, ऋर्षि और पितृ ऋण के निवारण के लिए श्राद्ध कर्म है। अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख-शांति की कामना ही वस्तुत: श्राद्ध कर्म है। 

कुतुप मुहूर्त-11:48 से 12:36 तक

रोहिण मुहूर्त- 12:36 से 13:24 तक

अपराह्न काल-13:24 से 15:48 तक

 

जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो

 

पूर्णिमा तिथि 24 सितंबर को 7.17 से प्रारम्भ होकर 25 सितंबर को 8.22 पर समाप्त होगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार श्राद्ध में उदय तिथि का महत्व नहीं होता अपितु तिथि की उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। जिस दिन मृत्यु हुई हो, उस तिथि का महत्व है। तिथि पर सवेरे तर्पण और दोपहर को भोजन कराया जाना चाहिए।

कैसे करें श्राद्ध

 

पहले यम के प्रतीक कौआ, कुत्ते और गाय का अंश निकालें। इसमें भोजन की समस्त सामग्री में से कुछ अंश डालें।फिर किसी पात्र में दूध, जल, तिल और पुष्प लें। कुश और काले तिलों के साथ तीन बार तर्पण करें। ऊं पितृदेवताभ्यो नम:पढ़ते रहें।बाएं हाथ में जल का पात्र लें और दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की तरफ करते हुए उस पर जल डालते हुए तर्पण करते रहें।वस्त्रादि जो भी आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं।

यदि ये सब न कर सकें तो

 

दूरदराज में रहने वाले, सामग्री उपलब्ध नहीं होने, तर्पण की व्यवस्था नहीं हो पाने पर एक सरल उपाय के माध्यम से पितरों को तृप्त किया जा सकता है। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके खड़े हो जाइए। अपने दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की ओर करिए। 11 बार पढ़ें..ऊं पितृदेवताभ्यो नम:। ऊं मातृ देवताभ्यो नम: ।

 

क्या न करें

तेल और साबुन का प्रयोग न करें ( जिस दिन श्राद्ध हो)।शेविंग न करें

जहां तक संभव हो, नए वस्त्र न पहनें, तामसिक भोजन न करें। तामसिक होने के कारण ही इनको निषिद्ध किया गया है।

पितरों की शांति के लिए यह भी करें

एक माला प्रतिदिन ऊं पितृ देवताभ्यो नम: की करें।

ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम:का जाप करते रहें।

भगवद्गीता या भागवत का पाठ भी कर सकते हैं।

 

यह भी ध्यान रखें

पुरुष का श्राद्ध पुरुष को, महिला का श्राद्ध महिला को दिया जाना चाहिए। यदि पंडित उपलब्ध नहीं हैं तो श्राद्ध भोजन मंदिर में या गरीब लोगों को दे सकते हैं। यदि कोई विषम परिस्थिति न हो तो श्राद्ध को नहीं छोडऩा चाहिए। हमारे पितृ अपनी मृत्यु तिथि को श्राद्ध की अपेक्षा करते हैं। यथा संभव उस तिथि को श्राद्ध कर देना चाहिए। यदि तिथि याद न हो और किन्हीं कारणों से नहीं कर सकें तो पितृ अमावस्या को अवश्य श्राद्ध कर देना चाहिए।

पितृ दोष प्रबल हो तो यह भी करें उपाय

यदि कुंडली में प्रबल पितृ दोष हो तो पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए। तर्पण मात्र से ही हमारे पितृ प्रसन्न होते हैं। वे हमारे घरों में आते हैं और हमको आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यदि कुंडली में पितृ दोष हो तो इन सोलह दिनों में तीन बार एक उपाय करिए। सोलह बताशे लीजिए। उन पर दही रखिए और पीपल के वृक्ष पर रख आइये। इससे पितृ दोष में राहत मिलेगी। यह उपाय पितृ पक्ष में तीन बार करना है।

 

श्राद्ध की तिथियां

 

24 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध

 

25 सितंबर - प्रतिपदा श्राद्ध

 

26 सितंबर - द्वितीय श्राद्ध

 

27 सितंबर - तृतीय श्राद्ध

 

28 सितंबर - चतुर्थी श्राद्ध

 

29 सितंबर - पंचमी श्राद्ध

 

30 सितंबर - षष्ठी श्राद्ध

 

1 अक्टूबर - सप्तमी श्राद्ध

 

2 अक्टूबर - अष्टमी श्राद्ध

 

3 अक्टूबर - नवमी श्राद्ध

 

4 अक्टूबर - दशमी श्राद्ध

 

5 अक्टूबर - एकादशी श्राद्ध

 

6 अक्टूबर - द्वादशी श्राद्ध

 

7 अक्टूबर -त्रयोदशी श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध

 

8 अक्टूबर - सर्वपितृ अमावस्या।


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इस बार 14 दिनों तक ही कर सकेंगे पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पण

वाराणसी। सनातनी परंपरा के तीन ऋणों में पितृ ऋण प्रमुख माना जाता है। पितरों को समर्पित आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष कहा जाता है। इस बार आश्विन मास की शुरुआत 26 सितंबर से होगी मगर सनातन धर्म में किसी पक्ष की शुरुआत उदया तिथि के अनुसार मानी जाती है और श्राद्ध-तर्पण का समय मध्याह्न में होना आवश्यक माना जाता है।

इस लिहाज से पितृपक्ष का आरंभ 25 सितंबर से हो रहा है। खास यह है कि इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष में षष्ठी तिथि की हानि से यह पक्ष 14 ही दिनों का होगा। ऐसे में द्वादशी और त्रयोदशी का श्राद्ध तर्पण छह अक्टूबर को किया जाएगा। सर्वपैत्री श्राद्ध अमावस्या व पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को मनाया जाएगा।

शास्त्रीय मान्यता

जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख, सौभाग्य आदि की अभिवृद्धि के लिए अनेक प्रयत्न व प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म ग्रहण करना निरर्थक है। उनके ऋण उतारने में कोई ज्यादा खर्च भी नहीं होता। केवल वर्ष भर में उनकी मृत्यु तिथि को सर्व सुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करने के साथ ही गो ग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्माणों को भोजन करा देने मात्र से ऋण उतर जाता है।

यह है विधान

ज्योतिषाचार्य ऋषि द्विवेदी के अनुसार, पितृ पक्ष में नदी तट पर विधिवत तर्पण तथा मृत्यु तिथि पर अपने पूर्वजों के श्राद्ध में ब्राह्माणों को भोजन श्रद्धा के साथ करवाकर पितरों को तृप्त व प्रसन्न किया जाता है। मृत्यु तिथि पर अपने पितरों को याद कर उनकी स्मृति में योग्य ब्राह्माण को श्रद्धा पूर्वक इच्छा भोजन करा के दान-दक्षिणा देते हुए संतुष्ट करना चाहिए। पितृ विसर्जन के दिन रात्रि में मुख्य द्वार पर दीपक जलाकर पितृ विसर्जन किया जाता है। यदि उन्हें यह उपलब्ध नहीं होता है, तो वे श्राप दे कर चले जाते हैं।

तिथि विशेष

प्रतिपदा का श्राद्ध 25 सितंबर, द्वितीया का श्राद्ध 26 सितंबर, तृतीया का श्राद्ध 27 सितंबर, चतुर्थी का श्राद्ध 28 सितंबर, पंचमी का श्राद्ध 29 सितंबर, षष्ठी का श्राद्ध 30 सितंबर, सप्तमी का श्राद्ध, एक अक्टूबर, अष्टमी का श्राद्ध दो अक्टूबर, नवमी का श्राद्ध तीन अक्टूबर, दशमी का श्राद्ध चार अक्टूबर, एकादशी का श्राद्ध पांच अक्टूबर, द्वादशी व त्रयोदशी का श्राद्ध छह अक्टूबर, चतुर्दशी का श्राद्ध सात अक्टूबर और पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को किया जाएगा।

 


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क्षमा प्रार्थना के मंत्र के साथ, ऐसे करें गणेश प्रतिमा का विसर्जन

मल्टीमीडिया डेस्क। गणेश महोत्सव पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। इसके साथ ही अब समय आ रहा है, जब गणेश जी का विसर्जन किया जाएगा। 10 दिनों तक हमारे घरों में विराजित रहने के बाद अब उन्हें विसर्जित किया जाएगा। मगर, कई लोगों को शायद यह जानकारी नहीं होगी कि विसर्जन के लिए क्या किया जाए।

सबसे पहले तो यह जान लें कि गणेशजी की विदाई की तैयारी वैसे ही करनी चाहिए जैसे घर से किसी व्यक्ति के यात्रा पर जाने के समय तैयारी की जाती है। सबसे पहले आरती और पूजन कर विशेष प्रसाद का भोग लगाएं। 

इसके बाद श्री गणेश का स्वस्तिवाचन करें। एक स्वच्छ पाटा लेकर उस पर स्वास्तिक का चिह्न बनाकर उस पर अक्षत रखें। इस पर एक साफ वस्त्र बिछाएं। पाटे के चारों कोनों पर चार सुपारी रखें।

गणेश प्रतिमा को उनकी स्थापना वाले स्थान से जयकारा लगाते हुए उठाकर उन्हें इस पाटे पर विराजित करें। फल, फूल, वस्त्र, दक्षिणा, लड्डू, मोदक रखें। इसके एक छोटी लकड़ी पर चावल, गेहूं, पंच मेवा की पोटली और यथाशक्ति दक्षिणा रखकर उसे बांधकर नदी या तालाब के विसर्जन स्थल तक ले जाएं। 

विसर्जन से पहले गणेशजी की फिर से आरती करें। श्री गणेश से खुशी-खुशी बिदाई करें और उनसे धन, सुख, शांति, समृद्धि का आशीर्वाद मांगे। साथ ही गणेश स्थापना से लेकर विसर्जन तक यदि जाने-अनजाने में कोई गलती हुई है, तो उसके लिए क्षमा प्रार्थना भी करें।

इसके बाद गणेश प्रतिमा को पूरे आदर और सम्मान के साथ वस्त्र और समस्त सामग्री के साथ धीरे-धीरे बहाएं।


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24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध पक्ष, जानिए देश में कहां-कहां होता है पिंडदान

मल्टीमीडिया डेस्क। 24 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं। श्राद्ध का अर्थ है, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रगट करना। पुराणों के अनुसार, मृत्यु के बाद भी जीव की पवित्र आत्माएं किसी न किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपनी परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं। पितरों के परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष के 15 दिनों में (प्रतिपदा से लेकर अमावस्या) तक यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं और समस्त पितर अपने-अपने हिस्से का ग्रास लेने के लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं, जिससे उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती है। 

मान्यताओं के अनुसार, मरने के बाद पिंडदान करना आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति कराता है। पिंडदान करने का सबसे ज्यादा महत्व बिहार के गया का है। इसी जगह पर भगवान राम ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था। हालांकि, इसके अलावा देश में कुछ अन्य जगहों पर भी पिंडदान किया जाता है।

पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों की संख्या में लोग अपने पितरों का पिण्डदान करते है। मान्यता है कि यदि इस स्थान पर पिण्डदान किया जाय, तो पितरों को स्वर्ग मिलता है। माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं, इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है। चार प्रमुख धामों में से एक बद्रीनाथ के ब्रहमाकपाल क्षेत्र में तीर्थयात्री अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। कहा जाता है कि पाण्डवों ने भी अपने पितरों का पिंडदान इसी जगह किया था। तीर्थराज प्रयाग में तीन प्रमुख नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग यहां पर अपने पूर्वजों को श्राद्ध देने आते है। 

काशी, यूपी 

 

 

कहते हैं कि काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है। यह जगह भगवान शिव की नगरी माना जाता है। काशी में पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यहां अकाल मृत्यु होने पर पिंडदान करने पर जीव आत्मा को मोक्ष मिलता है।

 

सिद्धनाथ, एमपी

उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धनाथ में लोग पितरों को श्राद्ध अर्पित करते हैं। कहा जाता है कि यहां माता पार्वती ने वटवृक्ष को अपने हाथों से लगाया था।

 

पिण्डारक, गुजरात

गुजरात के द्वारिका से 30 किलोमीटर की दूरी पर पिण्डारक में श्राद्ध कर्म करने के बाद नदी मे पिण्ड डालते हैं।लोग यहां अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं।


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बिना मेहनत के कैसे पाएं सब कुछ

गिरीशचंद्र घोष बांग्ला के प्रसिद्ध कवि-नाटककार थे। उनके एक धनी मित्र थे, जो अपनी रईसी अपने व्यवहार में भी दिखाते थे। वह कहीं जाते तो उनका नौकर उनके लिए चांदी के बर्तन साथ लेकर चलता था, ताकि वह अपना खाना उन्हीं में खाएं। घोष जी को यह बात अच्छी नहीं लगती थी पर वह मित्र का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। फिर उन्होंने तय किया कि वह उसकी इस आदत को सुधार कर रहेंगे।

एक दिन घोष जी ने अपने रईस दोस्त को खाने पर आमंत्रित किया। हमेशा की तरह उनके मित्र अपने नौकर के साथ पहुंचे। नौकर बर्तन लेकर आया था। लेकिन घोष जी अपने मित्र के आते ही उन्हें और लोगों के बीच ले गए। जब तक मित्र कुछ समझ पाते, तब तक उनके सामने पत्तल में खाना परोस दिया गया। बाकी लोगों के सामने भी पत्तल में खाना रखा था। 

उनके रईस मित्र संकोच में पड़ गए। उन्होंने नौकर को आवाज देनी चाही लेकिन तब तक सब लोग खाने लगे और उनसे भी खाने का अनुरोध करने लगे। मन मसोस कर उन्हें भी पत्तल में खाना पड़ा। खाने के बाद जैसे ही वह उठे तो घोष जी उनके बर्तनों में व्यंजन लेकर उनके सामने हाजिर हुए।

उन्होंने हंसते हुए मित्र से कहा, ‘‘क्षमा करें, थोड़ी गलतफहमी हो गई। जब तुम्हारे नौकर को घर की महिलाओं ने बर्तन लेकर आते देखा तो उन्हें लगा कि शायद तुम अपने बच्चों के लिए खाना ले जाना चाहते हो। उन्होंने इसमें खाना दे दिया है।’’ 

मित्र लज्जित होकर चले गए। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्होंने दिखावा करना छोड़ दिया। 

तात्पर्य यह कि धन का दिखावा बहुत ही निम्न श्रेणी के लोग करते हैं। भले ही वे धन का दिखावा कर स्वयं संतुष्ट हो जाते हैं, पर समाज उन्हें इस तुच्छ बात के लिए नकार देता है, जैसा कि गिरीशचंद्र घोष जी के धनवान मित्र के साथ हुआ। अगर कुछ दिखाना ही है तो लोगों के प्रति परोपकारी रहो, ताकि आपका यश चारों तरफ गूंजे।


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छोटी सी इलायची के बड़े कमाल

छोटी सी इलायची भोजन में सुगन्ध और स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। क्या आप जानते हैं इलायची केवल जायका बढ़ाने में ही नहीं बल्कि व्यक्ति के बंद भाग्य के भी सभी रास्ते खोलने में मदद करती है। तो आईए आज हम आपको इलायची के कुछ एेसे प्रभावी उपायों के बारे में बताएं, जो किसी की भी डूबती नैय्या को पार लगा सकते हैं।  यदि बहुत मेहनत करने के बाद भी जीवन में सफलता प्राप्त न हो तो हरे कपड़े में एक इलायची बांधकर रात में तकिए के नीचे रखें और सुबह उठकर किसी बाहरी व्यक्ति को दे दें। इस उपाय से सफलता के बीच आने वाली समस्त रूकावटों का अंत होता है।  पैसों की तंगी से छुटकारा पाने के लिए अपने पर्स या फिर जेब में पांच इलायची जरूर रखें। यह उपाय पैसे की सभी परेशानियों को दूर करने में मददगार साबित होता है।  सुंदर जीवन साथी पाने के लिए एक पीले कपड़े में 5 इलायची डालकर किसी गरीब को दान करें।  वैवाहिक जीवन में मधुरता बनाए रखने के लिए रात को सोने से पहले इलायची को दूध में उबालकर पीना चाहिए।  परीक्षा में अच्छे नंबर पाने के लिए एक छोटी इलायची को दूध में उबालकर किसी गरीब बच्चे को कम से कम 7 सोमवार तक पिलाएं। ऐसा करने से छात्रों का पढ़ाई में मन लगेगा, अकाग्रता बढ़ेगी और बुद्धि तेज होगी।