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बुधवार का गुडलक: वामन अवतार से मिलेगा निरोगी काया का वरदान

बुधवार दि॰ 28.03.18 को चैत्र शुक्ल द्वादशी के उपलक्ष्य में वामन द्वादशी पर्व मनाया जाएगा। श्रीमद्भगवदपुराण के अनुसार उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में इसी शुभ तिथि को श्रवण नक्षत्र के अभिजित मुहूर्त में भगवान विष्णु का वामन अवतार हुआ था। दैत्यराज बलि द्वारा देवों के पराभव के बाद ऋषि कश्यप के कहने पर माता अदिति के पुत्र प्राप्ति हेतु पयोव्रत का अनुष्ठान करती हैं। तब विष्णु चैत्र शुक्ल द्वादशी पर माता अदिति के गर्भ से प्रकट होकर अवतार लेते हैं व बटुक ब्राह्मण रूप धारण करते हैं। महर्षि कश्यप ऋषियों के साथ उनका उपनयन संस्कार करते हैं। महर्षि पुलह वामन को यज्ञोपवीत, अगस्त्य मृगचर्म, मरीचि पलाश दण्ड, आंगिरस वस्त्र, सूर्य छत्र, भृगु खड़ाऊं, गुरु जनेऊ व कमण्डल, अदिति कोपीन, सरस्वती रुद्राक्ष माला व कुबेर भिक्षा पात्र भेंट करते हैं।


वामन अवतार पिता से आज्ञा लेकर बलि के पास जाते हैं। उस समय राजा बलि नर्मदा के उत्तर-तट पर अन्तिम यज्ञ कर रहे होते हैं। वामन अवतार राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि मांगते हैं। बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए, विष्णु को तीन पग भूमि दान देते हैं। भगवान एक पग में स्वर्ग व दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं। अब तीसरे पग हेतु राजा बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देते हैं। वामन अवतार राजा बलि को पाताल लोक में साथ रहने का वचन देते हुए बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं। वामन द्वादशी के विशेष पूजन, व्रत व उपाय से निरोगी काया प्राप्त होती है, व्यावसायिक सफलता मिलती है व पारिवारिक कटुता दूर होती है। 


विशेष पूजन विधि: पूर्वमुखी होकर हरे वस्त्र पर वामन अवतार का चित्र स्थापित करके विधिवत दशोपचार पूजन करें। कांसे के दिए में गौघृत का दीप करें, चंदन से धूप करें, तुलसी पत्र चढ़ाएं, रक्त चंदन चढ़ाएं, मौसम्बी का फलहार चढ़ाएं, मिश्री का भोग लगाएं। तथा रुद्राक्ष माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें।


पूजन मुहूर्त: प्रातः 09:25 से प्रातः 10:25 तक।
पूजन मंत्र: ॐ तप रूपाय विद्महे श्रृष्टिकर्ताय धीमहि तन्नो वामन प्रचोदयात्।


आज का शुभाशुभ

स्त्री व पुरुष दोनों की बर्बादी का कारण बनते हैं ये 5 काम

शास्त्रों की मानें तो कुछ एेसे बुरे काम बताए गए हैं जो लंबे समय तक किसी से छिपाए नही जा सकते। आजकल के समय में चाहे कोई कितना भी इन कामों को छिपाने की कोशिश करे, फिर भी किसी न किसी तरह से समाज को इन कामों के बारे में पता लग ही जाता है। जब ये काम घर-परिवार और समाज में सभी को मालूम हो जाते हैं तो स्त्री हो या पुरुष, दोनों को ही अपमानित होना पड़ता है और कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहां जानिए महाभारत, रामायण और गरुड़ पुराण में बताए गए 5 कामों के बारें में।

 

झूठ बोलना
सभी जानते हैं कि एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ और बोलना पड़ते हैं, फिर भी झूठ अधिक समय तक छिप नहीं सकता है। महाभारत में कर्ण ने परशुराम से झूठ बोला था कि वह ब्राह्मण है। परशुराम में कर्ण को ब्राह्मण समझकर उसे सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया, लेकिन एक दिन परशुराम को ये सच्चाई मालूम हो गई कि कर्ण ब्राह्मण नहीं है। इसके बाद परशुराम ने शाप दे दिया था कि कर्ण को जिस समय इन अस्त्र-शस्त्र की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, उसी समय वह इन्हें चलाना भूल जाएगा। इसी शाप के कारण कर्ण महाभारत युद्ध में अर्जुन के सामने इन शक्तियों को भूल गया था और अर्जुन के बाण से मारा गया था। इसीलिए हमें भी झूठ बोलने से बचना चाहिए।


धोखा देना 
महाभारत युद्ध दुर्योधन और मामा शकुनि के धोखे और कपट का भी परिणाम था। कौरवों ने पांडवों के साथ कई बार कपट किया था और अंत में पांडवों के हाथों सभी कौरव मारे गए। भगवान भी कपटी लोगों की मदद नहीं करते हैं। इसीलिए कपट से बचना चाहिए। कपट भी लंबे समय तक छिप नहीं सकता है। दूसरों को धोखा देना पाप है और इस पाप की सजा अवश्य मिलती है।

 

हत्या करना
ये ऐसा पाप है, जिसकी सजा अवश्य मिलती है। शास्त्रों के अनुसार किसी की भी हत्या करना अक्षम्य पाप है। अक्षम्य यानी जिसके लिए क्षमा नहीं किया जा सकता है। हत्या कभी भी छिप नहीं सकती है। हमारे सामने इस संबंध में कई उदाहरण आते रहते हैं, जहां ये बात साबित हो जाती है कि कितनी भी पुख्ता योजना क्यों न हो, हत्या सामने आ ही जाती है। हत्या के दोषी को देर से सही पर सजा जरूर मिलती है। इस पाप को छिपाने की सभी कोशिशें असफल हो जाती हैं।

रविवार का गुडलक: महाअष्टमी पर महागौरी देंगी दुर्घटनाओं से सुरक्षा

रविवार दि॰ 25.03.18 को चैत्र अष्टमी को चैत्र नवरात्र के अंतर्गत अष्टम दुर्गा देवी महागौरी का पूजन किया जाएगा। देवी महागौरी राहु ग्रह पर अपना आधिपत्य रखती हैं। महागौरी मनुष्य के वयोवृद्ध मृत देह की स्थिति को संबोधित करती हैं। शब्द महागौरी का अर्थ है महान देवी गौरी। महागौरी के तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाशमय है। इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार देवी महागौरी के अंश से कौशिकी का जन्म हुआ जिसने शुंभ-निशुंभ का अंत किया। महागौरी ही महादेव की पत्नी शांभवी हैं। 


पौराणिक मतानुसार कालांतर में देवी पार्वती तपस्या के कारण शायमल हो जाती हैं ऐसे में महादेव उन्हें गंगा में स्नान करवाते हैं जिनसे देवी का वर्ण अत्यंत गौर हो जाता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत हो जाती है ऐसे में महादेव देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं। सफ़ेद वस्त्र धारण किये हुए देवी श्वेत रंग के वृष पर सवार हैं। शास्त्रनुसार चतुर्भुजी देवी महागौरी अपनी ऊपरी दाईं भुजा में अभय मुद्रा से भक्तों को सुख प्रदान करती हैं, नीचे वाली दाईं भुजा में त्रिशूल से संसार पर अंकुश रखती है, ऊपरी बाईं भुजा में डमरू से सम्पूर्ण जगत का निर्वाहन करती हैं व नीचे वाली बाईं भुजा से देवी वरदान देती हैं। 


कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार महागौरी व्यक्ति की कुंडली के छठे व आठवें भाव पर शासन से व्यक्ति के संबंध शत्रुनाश, रोगनाश, दांपत्य, विवाहबाधा, गृहस्थी व आयु का संचालन करती हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार इनकी दिशा नैत्रिग्य है। महागौरी की साधना उन लोगों हेतु सर्वश्रेष्ठ है जिनकी आजीविका का संबंध शेयर मार्केट, क्लार्क, पुलिस व सिक्योरिटी सर्विसेज से है। महागौरी की अराधना से रोगों का नाश होता है, दांपत्य सुखी रहता है व दुर्घटनाओं से सुरक्षा मिलती है। 


विशेष: इस नवरात्रि पर नवमी का क्षय हुआ है अतः आज ही राम नवमी का व्रत रखा जाएगा व राम नवमी पूजन भी आज किया जाएगा। सोमवार दि॰ 26.03.18 को मां सिद्धिदात्री के पूजन के साथ ही नवरात्रि का पारण किया जाएगा। 


पूजन विधि: घर के नैऋत्य कोण में दक्षिण-पश्चिम मुखी होकर सफेद कपड़े पर महागौरी का चित्र स्थापित कर उसका दशोपचार पूजन करें। केसर मिले गौघृत का दीप करेंं, मोगरे की धूप करें, सफेद-नीले फूल चढ़ाएं, चंदन से तिलक करें, दूध-शहद चढ़ाएं, व मावे की मिठाई का भोग लगाएं तथा 1 माला इस विशिष्ट मंत्र की जपें। पूजन के बाद भोग कन्या को खिलाएं।

चैत्र नवरात्रि में एकसाथ आई अष्टमी-नवमी तिथि, जानें कंजक पूजन का शुभ मुहूर्त

नवरात्र के दौरान आठवें अथवा नौवें दिन सुबह के समय कन्या पूजन किया जाता है। माना जाता है कि आहुति, उपहार, भेंट, पूजा-पाठ और दान से मां दुर्गा इतनी खुश नहीं होतीं, जितनी कंजक पूजन और लोंगड़ा पूजन से होती हैं। अपने भक्तों को सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करती हैं।

 
कन्या पूजन के लिए जिन कन्याओं को अपने घर आमंत्रित करें उनकी उम्र दो वर्ष से कम और नौ वर्ष से अधिक न हो क्योंकि इसी उम्र की कन्याओं को मां दुर्गा का रूप माना गया है। कन्याओं के साथ एक लोंगड़ा यानी लड़के को भी जिमाते हैं। माना जाता है कि लोंगड़े के अभाव में कन्या पूजन पूर्ण नहीं होता।


18 मार्च से चैत्र नवरात्रि का आरंभ शैलपुत्री के पूजन और घट स्थापना के साथ हुआ था। 26 मार्च को देवी सिद्धिदात्री के पूजन के साथ ही नवरात्रि का पारण और पूर्णाहुति की जाएगी। इससे पूर्व अष्टमी-नवमी तिथि एक ही दिन आ रही है। इन दो दिनों में कंजक पूजन किए जाने का विधान है। 


24 मार्च को श्री दुर्गा अष्टमी सुबह 10 बज कर 6 मिनट के बाद आरंभ हो जाएगी। कंजक पूजन का  शुभ मुहूर्त 25 मार्च को प्रात: 8 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। इसके बाद नवमी तिथि का आरंभ हो जाएगा। श्री रामनवमी व्रत एवं  भगवान श्री रामचंद्र जी का जन्म उत्सव भी इसी दिन मनाया जाएगा

अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर

औरंगाबाद: देश में मंदिर तो कई हैं लेकिन प्रसिद्ध मंदिर की सूची में कुछ गिने-चुने मंगिरों के नाम ही आते हैं। उन्हीं में से एक बिहार का सबर्य मंदिर है जो औरंगाबाद जिले में स्थित है। यह ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल देव में मौजूद त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी कलात्मक भव्यता के लिए सर्वविदित और प्रख्यात होने के साथ ही सदियों से देशी-विदेशी पर्यटकों, श्रद्धालुओं और छठव्रतियों की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की अभूतपूर्व स्थापत्य कला, शिल्प, कलात्मक भव्यता और धार्मिक महत्ता के कारण ही जनमानस में यह किंवदति प्रसिद्ध है कि इसका निर्माण देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया है। देव स्थित भगवान भास्कर का विशाल मंदिर अपने अप्रतिम सौंदर्य और शिल्प के कारण सदियों श्रद्धालुओं, वैज्ञानिकों, मूर्तिचोरों, तस्करों एवं आमजनों के लिए आकर्षण का केंद्र है। मंदिर के निर्माणकाल के संबंध में उसके बाहर ब्रह्म लिपि में लिखित और संस्कृत में अनुवादित एक श्लोक जड़ा है, जिसके अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेता युग के बीत जाने के बाद इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने देव सूर्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया। शिलालेख से यह भी पता चलता है कि साल 2016 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल का एक लाख पचास हजार सोलह वर्ष पूरा हो गया है।  देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों-उदयाचल-प्रात: सूर्य, मध्याचल- मध्य सूर्य और अस्ताचल-अस्त सूर्य के रूप में विद्यमान है। पूरे देश में देव का मंदिर ही एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है।  करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अदभुत उदाहरण है। बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, अद्र्धवृत्ताकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में काटे गएे पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है।


जनश्रुतियों के आधार पर इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कई किंवदतियां प्रसिद्ध है जिससे मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता तो चलता है लेकिन इसके निर्माण के संबंध में अभी भी भ्रामक स्थिति बनी हुई है। निर्माण के मुद्दे को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के बीच चली बहस से भी इस संबंध में ठोस परिणाम प्राप्त नहीं हो सका है।  जनश्रुति के अनुसार ऐल एक राजा थे, जो किसी ऋषि के श्राप वश श्वेत कुष्ठ से पीड़ित थे। वे एक बार शिकार करने देव के वन प्रांत में पहुंचने के बाद राह भटक गये। राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखायी पड़ा जिसके किनारे वे पानी पीने गये और अंजुरी में भरकर पानी पिया। पानी पीने के क्रम में वे यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गये कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी का स्पर्श हुआ, उन जगहों के श्वेत कुष्ठ के दाग जाते रहे। इससे अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित राजा अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करते हुए सरोवर के गंदे पानी में लेट गये और इससे उनका श्वेत कुष्ठ पूरी तरह जाता रहा।  राजा ने अपने शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचित हो इसी वन प्रांतर में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया और रात्रि में राजा को सपना आया कि उसी सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी पड़ी है। प्रतिमा को निकालकर वहीं मंदिर बनवाने और उसमे प्रतिष्ठित करने का निर्देश उन्हें सपने में प्राप्त हुआ।  कहा जाता है कि राजा ऐल ने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्य कुण्ड का निर्माण कराया लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्ति का आज तक पता नहीं है। जो अभी वर्तमान मूर्ति है वह प्राचीन अवश्य है, लेकिन ऐसा लगता है मानो बाद में स्थापित किया गया हो। मंदिर परिसर में जो मूर्तियां हैं, वे खंडित तथा जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं।


मंदिर निर्माण के संबंध में एक कहानी यह भी प्रचलित है कि इसका निर्माण एक ही रात में देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों किया था और कहा जाता है कि इतना सुंदर मंदिर कोई साधारण शिल्पी बना ही नहीं सकता। इसके काले पत्थरों की नक्काशी अप्रतिम है और देश में जहां भी सूर्य मंदिर है, उनका मुंह पूरब की ओर है, लेकिन यही एक मंदिर है जो सूर्य मंदिर होते हुए भी ऊषाकालीन सूर्य की रश्मियों का अभिषेक नहीं कर पाता वरन अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें ही मंदिर का अभिषेक करती हैं।  जनश्रुति है कि एक बार बर्बर लुटेरा काला पहाड़ मूत्र्तियों एवं मंदिरों को तोड़ता हुआ यहां पहुंचा तो मंदिर के पुजारियों ने उससे काफी विनती की कि इस मंदिर को कृपया न तोड़ें क्योंकि यहां के भगवान का बहुत बड़ा महात्य है। इस पर वह हंसा और बोला यदि सचमुच में तुहारे भगवान में कोई शक्ति है तो मैं रात भर का समय देता हूं तथा यदि इसका मुंह पूरब से पश्चिम हो जाये तो मैं इसे नहीं तोडूंगा। पुजारियों ने सिर झुकाकर इसे स्वीकार कर लिया और वे रातभर भगवान से प्रार्थना करते रहे। सबेरे उठते ही हर किसी ने देखा कि सचमुच मंदिर का मुंह पूरब से पश्चिम की ओर हो गया था और तब से इस मंदिर का मुंह पश्चिम की ओर ही है।  इस मंदिर के निर्माण से संबंध विवाद चाहे जो भी हो, कोई साफ अवधारणा भले ही नहीं बन पायी हो लेकिन इस मंदिर की महिमा को लेकर लोगों के मन में अटूट श्रद्धा एवं आस्था है। यही कारण है कि हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में लाखों लोग विभिन्न स्थानों से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते हैं। लोगों का विश्वास है कि कार्तिक एवं चैती छठ व्रत के मौके पर सूर्य देव की साक्षात उपस्थिति की रोमांचक अनुभूति होती है।

अनमोल वचन: जीवन की हर स्थिति में बनाए रखें धैर्य

भोले नाथ भोले भक्तों पर ही प्रसन्न होते हैं। भक्ति में दिमाग की नहीं दिल की कीमत होती है। धनवान बनो -धन से ही नहीं-बल्कि दिल से भी धनवान बनो ताकि किसी गरीब-लाचार की मदद भी कर सको। —सुयोग मुनि  —अमरनाथ भल्ला, लुधियाना


जो पति-पत्नी आपस में उलझे रहते हैं उनके बच्चे भी परेशान रहते हैं। ऐसे में घर के बुजुर्ग ही घर के वातावरण को शांतमय बनाते हैं। इसीलिए कहते हैं बड़े बुजुर्गों का घर में होना जरूरी होता है। —विजय शंकर 


जीतने वाला ही नहीं बल्कि कहां पे क्या हारना है, यह जानने वाला भी सिकंदर होता है।

 

झुकने से रिश्ता गहरा हो तो झुक जाओ, पर हर बार आपको ही झुकना पड़े तो रुक जाओ।

 

जीवन का सही आनंद लेने के लिए इंसान की आर्थिक स्थिति नहीं, मानसिक स्थिति सही होनी चाहिए। 

 

कभी किसी के बहते आंसू पोंछ कर देखिए तो सही, खुद आपको बड़े से बड़ा दुख बहुत छोटा लगेगा।

 

पैसा नई-नई रिश्तेदारियां बनाता है मगर असली और पुरानी बिगाड़ देता है। —जगजीत सिंह भाटिया, नूरपुर बेदी (रोपड़)


किसी मनुष्य की बुराई को बताना ‘आम’ लोगों की पहचान है, पर बुराई में अच्छाई ढूंढना, ‘खास’ लोगों की पहचान है।

 

इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध बढ़ता है और इच्छा पूरी होती है तो लोभ बढ़ता है। इसलिए जीवन की हर स्थिति में धैर्य बनाए रखें।

 

कामयाबी’ का जुनून होना चाहिए, फिर ‘मुश्किलों’ की क्या औकात है।

शनि अमावस्या 2018: आ रहा है शनिदेव की कृपा पाने का दिन, करें उपाय

17 मार्च शनिवार को मोक्षदायिनी, पुण्यदायिनी शनि अमावस्या पड़ रही है। ये शुभ दिन शनिवार को आने के कारण शनैश्चरी अमावस्या कहलाएगा। शनि हर व्यक्ति के जीवन पर बड़ा प्रभाव डालते हैं। जीवन में तीन बार साढ़ेसाती, दो ढैय्या, 19 साल की महादशा शनि की रहती है। लगभग 31 साल तक शनि का अच्छा-बुरा प्रभाव रहता है। जिन्हें शनि से परेशानी रहती है, उनके लिए हम इस ग्रह की शांति के लिए सामान्य उपाय दे रहे हैं। इन्हें शनि अमावस्या के दिन करने से शीघ्र लाभ मिलता है।


अमावस पर एक किलो उड़द की दाल का आटा, दो किलो गुड़, आधा किलो काले तिल, 100 ग्राम सरसों का तेल लें। आटे को तेल में भून कर गुड़ व तिल मिला दें। शनिदेव के मंदिर में इसका भोग लगा कर वापस ले आएं। रोज इसमें से प्रसाद निकाल कर चींटियों को डालें।


अमावस पर जरूरतमंद को छाता दान दें।


अमावस पर घर, दुकान, आफिस की सफाई करें। मुख्य द्वार पर दीपक जलाएं।


अमावस पर अपना पहना जूता, चप्पल दान करें।


महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें : ओम् त्रयम्बकम् यजामहे, सुगान्धिम् पुष्टि वर्धनम। उर्वारुक मिवबन्धनान्, मृर्त्योमोक्षीय मामुतात्।।


बड़ के पेड़ की जड़ में मीठा दूध डालें।


बांसुरी में खांड भर कर दबाएं। 


सवा सौ ग्राम काले चने, कोयला, कील काले कपड़े में बांध कर 7 बार वार कर खड़े पानी में फैंकें।

“मदर टैम्पल ऑफ बेसकिह” के नाम से जाना जाता है इंडोनेशिया का ये मंदिर

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का प्रभाव न केवल भारत में है बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, जिनमें सबसे विशेषकर इंडोनेशिया में हिंदू परंपराओं और मंदिरों की बहुत महत्ता प्रदान है। यह एक ऐसा देश है, जहां पर हिंदू मंदिरों की भरमार देखी जा सकती है। यहां बहुत सारे विराट, वैभवशाली और आकर्षक मंदिर हैं। इंडोनेशिया के मुख्य शहर बाली में कई प्रसिद्ध और विशाल हिंदू मंदिर हैं। उन्हीं में से एक है पूर बेसकिह मंदिर। यह मंदिर न सिर्फ इंडोनेशिया बल्कि पूरी दुनिया के सबसे खूबसूरत हिंदू मंदिरों में गिना जाता है। पहाड़ों के बीच बसे इस मंदिर की खूबसूरती ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। अगुंग नाम के पहाड़ पर बना यह मंदिर एक आइलैंड की तरह दिखाई देता है।


बेसकिह
बेसकिन शब्द संस्कृत के वासुकि शब्द से आया है, वासुकि नाग का वर्णन कई ग्रंथों और पुराणों में पाया जाता हैं। वासुकि शब्द को बाद में जावा भाषा में बदल कर बेसकिह कर दिया गया। जावा भाषा में बेसकिह का अर्थ होता है- बधाई।

तेनालीराम ने एेसे किया राजा कृष्ण देव का अंधविश्वास दूर

प्राचीन समय की बात है, राजा कृष्णदेव के राज्य में सुखदेव नामक एक आदमी रहता था। सुखदेव के बारे में ये बात अधिक प्रसिद्ध थी कि जो कोई भी सुबह-सुबह उसका मुख देख लेता, उसे पूरे दिन खाना नसीब नहीं होता। उड़ती-उड़ती यह बात महाराज कृष्णदेव राय के कानों तक पहुंची। महाराज ने सोचा कि यदि ऐसा वाकई है तो इस मामले की जांच करनी चाहिए। यही सोचकर उन्होंने सुखदेव को बुलवाया और रात में खूब खातिरदारी करके अपने कक्ष में ही उसका बिस्तर लगवा दिया। अगले दिन महाराज सुबह उठे और सुखदेव का चेहरा देखा। उसके हालचाल पूछे, फिर अपने रोजाना के कामों में व्यस्त हो गए। किसी काम में वैसे उलझ गए कि उन्हें खाना तो क्या नाश्ता भी न मिला।खैर दोपहर हो गई और महाराज के सामने खाना परोसा गया, लेकिन उनके महल में कोई ऐसी घटना घटी की उन्हें खाना छोड़कर जाना पड़ा। शाम तक इसी तरह की घटनाएं घटती रही और महाराज को खाना नहीं मिला। उसी समय महाराज ने सोचा कि यह इंसान वाकई मनहूस है। उन्होंने तुरंत सिपाहियों को बुलाया और सुखदेव को फांसी चढ़ाने का आदेश दिया। जब यह खबर तेनालीराम के कानों तक पहुंची तो वे निर्दोष सुखदेव के पास पहुंचे और बोले यदि तुम्हें अपनी जान बचाना है तो जैसा में कहता हूं करो। सुखदेव ने कहा- जी आप जैसा कह रहे हैं मैं वैसा ही करूंगा। तेनालीराम वहां से चले गए। शाम को दरोगा आए और उससे पूछा- सुखदेव महाराज का आदेश है कि यदि तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा हो तो कहो जरूर पूरी की जाएगी।

सुखदेव बोला- दरोगा जी मैं सारी प्रजा के सामने यह बात कहना चाहता हूं कि मैं मनहूस हूं। जो मेरी शक्ल देख लेता है, उसे भोजन नसीब नहीं होता, मगर महाराज मुझसे बड़े मनहूस हैं, मैंने आज सुबह उनकी शक्ल देखी और शाम को मुझे फांसी चढ़ना पड़ रहा है। जाओ दरोगा जी यही मेरी आखिरी इच्छा है।दरोगा ने ये बात जाकर महाराज को बताई। दरोगा कि बात सुनकर महाराज को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने फांसी की सजा रद्द कर दी। सिपाही उसे लेकर आए तो महाराज ने उसे सम्मान सहित अपने पास बैठाया, फिर बड़े ही प्यार से पूछा – सच बताना सुखदेव यह बात तुम्हें कैसे सूझी। सुखदेव ने कहा महाराज तेनालीराम ने मुझे ये तरीका सुझाया।

ये सुख प्राप्त कर बनें सही मायने में आदमी, स्वयं को कभी गरीब नहीं मानेंगे

प्यासे को पानी पिलाना एवं दुख में भी सुख की आशा करना इंसान की प्रवृत्ति है। यदि वास्तव में हमें जीवन के रहस्य को पकडऩा है तो सबसे पहले खुद को समझना होगा। स्वयं को देखने की रुचि जग गई तो दूसरों को देखने की बात खत्म हो जाएगी। महान बॉक्सर मोहम्मद अली ने कहा भी है कि सपनों को सच करने का सबसे अच्छा तरीका है कि जाग जाएं। इस दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो वर्तमान से ज्यादा भविष्य की चिंता करते हैं। भविष्य की चिंता करना कोई गलत बात नहीं है, किंतु यह चिंता जब दिल-दिमाग पर छा जाती है तो बीमारी का रूप ले लेती है। 


आज तो है, कल रहेगा कि नहीं, की चिंता में बहुत से लोग अपना सुख-चैन गंवा बैठे हैं। यह एक तरह की मानसिक बीमारी है। इसका इलाज किसी वैद्य-हकीम के पास नहीं, इसका उपचार तो कोई ज्ञानी आदमी या कोई मनोवैज्ञानिक ही कर सकता है। बेंजामिन डिजरायली कहते हैं कि हालात इंसान के काबू में नहीं हैं लेकिन बर्ताव आदमी के अपने हाथ में है।


सुखी जीवन का पहला पायदान है संतोष। आज के युग में संतोषी व्यक्ति चिराग लेकर ढूंढने पर भी शायद नहीं मिलेंगे। कोई व्यापार को लेकर तो कोई परिवार को लेकर चिंता में डूबा है। बेटों की चिंता में दुबले हुए जा रहे अनेक पिता आपको मिल जाएंगे। जबकि इस तरह की प्रवृत्ति आदमी को आलसी, निस्तेज और कायर बनाती है और स्वावलंबन की प्रवृत्ति पुरुषार्थी, तेजस्वी और साहसी बनाती है।


संतोष न होने से विकास भी असंतुलित होता है। मानवीयता का विकास न हो या उसके विकास की गति बहुत मंद हो तो एक बड़ा असंतुलन पैदा हो जाएगा। यही हो भी रहा है। धन की आमद बढ़ी है लेकिन चेतना का स्रोत सूखता जा रहा है। आदमी क्रूर, निर्दयी, कठोर और संवेदना शून्य होता जा रहा है। महान दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा है कि आपको सही मायने में आदमी बनना है तो अनुभव के सुख तक जाना होगा। पदार्थ का सुख आप प्राप्त कर सकें या नहीं, अनुभूति का सुख आपको मिल गया तो आप स्वयं को कभी गरीब नहीं मानेंगे। 

गाय माता को इस विधि से खिलाई गई रोटी, क्रूर ग्रहों को करती है शांत

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य, मंगल, शनि, केतु, क्रूर ग्रह हैं। यदि ये ग्रह किसी की कुंडली में शत्रु क्षेत्री नीच आदि होकर स्थिर हों तो ज्यादा क्रूर प्रभाव दिखाते हैं। इनकी शांति हेतु निम्र उपाय हैं-


सूर्य की महादशा के लिए : गेहूं के आटे की रोटी में गुड़ मिलाकर प्रत्येक रविवार को (गाय को)खिलाने से सूर्य की महादशा ठीक होती है।


मंगल ग्रह : गेहूं के आटे में मलका मसर (पीसकर) मिलाएं। गुड़ व गोघृत सहित बनाकर प्रत्येक मंगलवार को लाल गाय को खिलाने से मंगल ग्रह जनित दोष दूर होगा।


शनि ग्रह : काले तिल या उड़द पीस कर गेहूं के आटे में मिला कर गुड़ गोघृत से पेड़ा बनाकर कम से कम 9 शनिवार काली गाय को अपनी हथेली पर रख कर खिलाएं, शनिग्रह की प्रसन्नता प्राप्त होगी।


राहू केतु ग्रह : सतनाजे को पीसकर गेहूं का आटा, गुड़, गाय का घी मिलाकर  बूढ़ी लंगड़ी असहाय (चितबरी) गायों को प्रात: 12 बजे तक खिलाएं। अनाथ गाय की घर में अथवा किसी गोशाला की जीवन पर्यन्त सेवा की जिम्मेदारी लेने से राहू की दशा व दोष शमन शान्त होते हैं। 


सर्वग्रह शान्ति के लिए: प्रतिदिन पहली रोटी गुड़, गोघृत लगाकर अथवा चने की दाल, गुड़, हथेली पर रख कर मौनावस्था में गाय को खिलाने से प्रतिदिन गौमाता की कृपा रहेगी। विघ्न बाधा, दुर्घटना से बचाव होगा। 

एेसी उंगलियों वाली लड़कियां वैवाहिक जीवन के लिए होती है बिल्कुल Perfect

कहते हैं हर किसी को अपने जीवन साथी की तलाश बहुत सूझ-बूझ के साथ करनी चाहिए। तो यदि आप भी एक अच्छी जीवन साथी की तलाश कर रहे हैं तो ज्योतिष की कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखें। क्योंकि अगर व्यक्ति ज्योतिष की कुछ बातों को ध्यान में रखकर अपनी होने वाली जीवन संगिनि की तलाश करता है तो वे उसके लिए लकी साबित हो सकती है। 

यहां जानें कैसी उंगलियों वाली लड़की अपने पति के लिए होती हैं लकी 


गोल और लंबी उंगलियों वाली लड़कियां अपने औरअपने पति के लिए बेहद सौभाग्यशाली मानी जाती हैं।


जिन लड़कियों की उंगलियां चिकनी, सीधी और गांठ रहित होती हैं, वह वैवाहिक जीवन के लिए बिल्कुल परफेक्ट मानी जाती हैं।


जिन लड़कियों के उंगलियों के आगेका हिस्सा पतला और उंगलियों के पौर एक समान हो, इनका वैवाहिक जीवन भी सुख-शांति की नजर से बेहतर माना गया है।


छोटी उंगलियां वाली लड़कियां ज्यादा खर्चीली होती हैं। ऐसी महिलाओं का भविष्य काफी कठिनाइयों से भरा होता है।


दोनों हाथों की उंगलियों को जोड़ने पर यदि उनके बीच खाली जगह दिख रही हो तो ऐसी लड़की मध्यम सुख देने वाली होती है।


लड़कियों की उंगलियों में तीन पर्व (पोर) का होना भाग्यशाली होता है, ऐसी लड़कियां अपने जीवन में हर सुख प्राप्त करती हैं। 


जिस लड़की की उंगलियों में चार पर्व हों, उंगलियां छोटी व मांस कम हो तो वे अपने पति व स्वयं के लिए भाग्यशाली नहीं होतीं।


जिस लड़की की हथेली के पीछे बाल होते हैं उसे व उसके पति को वैवाहिक जीवन में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।