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इनफ़ोसिस आज उचाईयो पे , दूसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्यात वाली कंपनी

ByRameshwar Lal

Jul 21, 2021

देश की दिग्गज सूचना प्रौद्योगिकी (IT) कंपनी इंफोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने जबरदस्त खुलासा किया है। उनके मुताबिक, 1990 में कंपनी को केवल 2 करोड़ रुपए में खरीदने का ऑफर मिला था। हालांकि इस ऑफर्स को खुद वे और उनके को-फाउंडर्स ने ठुकरा दिया था। अब यही इंफोसिस 6.60 लाख करोड़ रुपए के मार्केट कैप वाली कंपनी बन गई है।

दूसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्यात वाली कंपनी

इंफोसिस देश की दूसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर निर्यात करने वाली कंपनी है। एक इंगलिश वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में मूर्ति ने यह जानकारी दी है। दरअसल 24 जुलाई को देश में उदारीकरण के 30 साल पूरे हो रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने यह जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि हमने उस समय कंपनी में बने रहने का फैसला किया और इसका नतीजा सामने है।

सुधारों के कारण इंफोसिस को हुआ फायदा

मूर्ति ने कहा कि यह सब कुछ जो आज है, वह उस समय कंपनी के फाउंडर्स की प्रतिबद्धता और 1991 में हुए आर्थिक सुधारों के बिना संभव नहीं था। इन सुधारों के कारण इंफोसिस जैसी कंपनियों को अपने लिए मार्केट तलाशने की छूट मिली थी। इससे पहले उन्हें कई तरह की मंजूरियों के लिए सरकार पर निर्भर रहना पड़ा था। उन्होंने बताया कि 1991 में हुए बड़े बदलाव ने कैसे अचानक इंफोसिस के लिए सफलता के रास्ते खोल दिए थे।

1991 में बहुत छोटी साइज की थी कंपनी

मूर्ति ने कहा कि 1991 में इंफोसिस बहुत छोटी साइज की कंपनी थी। कंपनी की उम्मीदें, महत्वाकांक्षाएं और दायरा भी बड़ा नहीं था। कंपनी की ऑफिस बैंगलोर के जया नगर में थी। हमारा बहुत सा समय कंप्यूटर और एक्सेसरीज खरीदने के इम्पोर्ट लाइसेंस को हासिल करने के लिए दिल्ली की यात्रा में बीत जाता था। कंपनी के युवा एंप्लॉयीज प्रोजेक्ट्स पर काम करने विदेश जाते थे और उनके लिए फॉरेन एक्सचेंज लेने मुंबई में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) जाना होता था।

उन दिनों कंप्यूटर इम्पोर्ट करने की प्रक्रिया काफी जटिल थी। बैंकों को सॉफ्टवेयर की जानकारी नहीं थी और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री को टर्म लोन और वर्किंग कैपिटल लोन नहीं दिए जाते थे।

10 वर्षों की मेहनत के बाद भी पैसा नहीं हुआ

मूर्ति ने बताया कि कंपनी के सह संस्थापकों के पास 10 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद भी इतना पैसा नहीं था कि वे घर और कार खरीद सकें। उनके घर पर फोन तक नहीं होता था। उन्होंने कहा कि कंपनी ने जब एक कंप्यूटर को इम्पोर्ट करने के लिए लाइसेंस का आवेदन किया तो उस प्रक्रिया में दो से तीन वर्ष लगने के साथ ही कई बार दिल्ली जाना पड़ा था। उस दौर में अमेरिका में टेक्नोलॉजी प्रत्येक छह महीने में बदल जाती थी और इंफोसिस को कंप्यूटर इम्पोर्ट करने का लाइसेंस मिलने पर 50% अधिक कैपेसिटी के साथ एक नया वर्जन आ जाता था।

भारतीय बाजार की तेजी से खुशी

इस समय भारतीय शेयर बाजार की तेजी और इंटरनेट से जुड़ी कंपनियों को लेकर उत्साह के बारे में मूर्ति ने कहा कि मैं इन कंपनियों को और सफल होने के लिए शुभकामना देता हूं। इंफोसिस पब्लिक ऑफर लाने वाली दूसरी सॉफ्टवेयर कंपनी थी। पहली कंपनी मूर्ति के दोस्त अशोक देसाई की मस्टेक थी जिसका पब्लिक ऑफर 1992 में आया था। इंफोसिस 1991 में IPO लाना चाहती थी लेकिन राजीव गांधी की हत्या, बाबरी मस्जिद विध्वंस और हर्षद मेहता स्कैम के कारण इसमें देरी हुई।

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