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मरूभूमि में पानी की बचत के लिए पुरातन मटका विधि से पौधरोपण

ByRameshwar Lal

Jun 25, 2021


जयपुर टाइम्स
चूरू(निसं.)। मरूधरा में पानी की कमी अब पौधारोपण के बीच कोई समस्या नहीं रहेगा। यह संभव होगा हजारों वर्ष पुरानी मटका विधि से होने वाले पौधरोपण से। इस विधि में बहुत कम पानी में पौधे सर्वाइव कर सकेंगे। गुरुवार को इस विधि से ग्राम पंचायत मिखाला के पीपली जोहड़ में पौधरोपण किया गया। विकास अधिकारी संतकुमार मीणा ने बताया कि पीपली जोहड़ में स्थित भभूता महाराज मंदिर की दूरी मिखाला से 5 किलोमीटर से अधिक है। वहाँ एक पानी के कुंड के अलावा और कोई जलस्रोत नहीं होने पर मंदिर परिसर में 2 हैक्टेयर भूमि पर मनरेगा योजना में पौधरोपण के लिए सरपंच रेणु कंवर के माध्यम से विगत वित्तीय वर्ष में 100 दिवस का रोजगार प्राप्त करने वाले परिवारों से एक घर से मटका लाने का आहवान किया गया और इस विधि से ग्रामीणों ने पौधरोपण किया। ग्राम विकास अधिकारी रामजीलाल सहारण, समाजसेवक कानसिंह ने घर घर जाकर मटका पद्धति के बारे में जागरूक करने पर 170 परिवारों ने मटके उपलब्ध करवाये। सरपंच रेणु कंवर ने बताया कि पौधारोपण के दौरान 101 फलदार व छायादार नीम, बकायण, जामुन, शहतूत, गुलमोहर, सिरस, बील के पौधे मनरेगा में 100 दिवस पूरे करने वाले परिवारों के महिला व पुरुषों से लगवाये गये। पंचायत समिति के सहायक अभियंता बलवंत सारण व कनिष्ठ अभियंता विनोद धायल ने महिला, पुरुषों को विधि के बारे में विस्तार से बताया। पौधरोपण स्थल पर ही सभी महिला व पुरुषों ने सामाजिक दूरी बनाये रखते हुए मटका पद्धति से पौधरोपण किया। पौधरोपण के अवसर सरपंच रेणु कंवर ने सभी ग्रामीणों को पारिवारिक वानिकी के तहत पेड़ को परिवार का हरित सदस्य मानकर पालन पोषण करने व सामाजिक, र्धामिक, विवाह समारोह में भोजन व्यर्थ नहीं करने की शपथ दिलाई। इस अवसर पर उपसरपंच विजय सिह धाणक, सुमेर सिंह सोनगरा, वृक्ष मित्र डुगर नाई, भामाशाह दीपचंद मास्टर , महाराज प्रकाश शास्त्री, प्रकाश खैरवा सहित अन्य नागरिक उपस्थित थे।
क्या है मटका विधि
बीडीओ मीणा ने मटका पद्दति के बारे में बताया कि मटका पद्धति में पौधे से कुछ हीं दूरी पर मिट्टी के मटके के तली में एक छोटा छिद्र करके जमीन के अंदर गाड़ दिया जाता है। मटके के छिद्र में जुट की रस्सी बांधी जाती है। पौधा रोपण के पश्चात मटके के निचले हिस्से को भी पौधे जड़ की तरह ही मिट्टी से ढक दिया जाता है जबकि मटके का मुंह खुला ही रहता है। इसमें जब पौधे में पानी डालने की आवश्यकता होती है तब सीधे पौधे में पानी न डाल कर मटके में डाला जाता है। मटके में लगी जुट की रस्सी के जरिए पौधे की जड़ों में बूंद-बूंद करके पानी जाता है, जिससे पानी की बचत भी होती है और पौधे लंबे समय तक जीवित रहते है। एक बार मटके में पानी भरने के बाद 5 दिनों तक पानी डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मरुस्थलीय क्षेत्रों में या जहां कहीं भी पानी की कमी रहती है, वहां पौधे की भी वर्षा के लिए बहुमात्रा में आवश्यकता होती है। ?सी जगहों पर मटका पद्धति द्वारा कम पानी में भी पौधा रोपण किया जा सकता है।
पूरे ब्लॉक में होगा मटका विधि से पौधरोपण
बीडीओ मीणा ने बताया कि पूरे पंचायत समिति में फलदार व छायादार पौधों को कम पानी में रोपित करने के लिए सभी सरपंचों को प्रेरित कर मटका पद्धति से पौधे रोपण करवाया जायेगा, इससे पानी की बचत के साथ साथ आयु भी अधिक होती है। बीडीओ ने बताया कि उपखण्ड अधिकारी मोनिका जाखड़ के मार्गदर्शन में हरित तारानगर मुहिम में पंचायत समिति तारानगर के सभी अधिकारी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि एक दूसरे से मिलने पर व वाट्सएप गु्रप में अभिवादन, संबोधन नमस्ते की जगह हरित प्रणाम से करते है।
मटका विधि का नवाचार अनुकरणीय
मटका विधि से किए गए इस नवाचार की चारों तरफ तारीफ हो रही है। तारानगर विधायक नरेन्द्र बुडा़निया ने कहा कि मनरेगा में मटका पद्धति से वृक्षारोपण नवाचर अनुकरणीय पहल है इससे हरित तारानगर के साथ साथ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मरूभूमि से हरित राजस्थान का स्वप्न साकार होगा। एसीईओ डॉ नरेंद्र चौधरी ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के नवाचार निस्संदेह अनुकरणीय हैं। प्रधान संजय कस्वां ने कहा कि हजारों वर्ष पुराना मटका पद्धति से पौधरोपण होने पर कम पानी में भी मरूभूमि में हरित भूमि होगी।

अनूठी व अनुकरणीय पहल मनरेगा में प्रयोग से पूरे देश में हरित क्रांति का आगाज होगा।

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