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RSS की यही सोच, भागवत के बयान पर संघ के अंदर विरोध के स्वर

ByRameshwar Lal

Jul 6, 2021

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के मुसलमानों के साथ हिंदुओं के रिश्ते पर बयान ने वैचारिक गर्मी पैदा कर दी है। संघ में ही बहुत से लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। इन लोगों का कहना है कि गुरुजी गोलवलकर के जमाने में हिंदुत्व को लेकर संघ की सोच इससे अलग रही थी।

 विवाद की जड़ में संघ प्रमुख डॉ. भागवत का रविवार को गाजियाबाद में दिया वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘यदि कोई हिंदू कहता है कि मुसलमान यहां नहीं रह सकता है, तो वह हिंदू नहीं है। गाय एक पवित्र जानवर है, लेकिन जो इसके नाम पर दूसरों को मार रहे हैं, वो हिंदुत्व के खिलाफ हैं। ऐसे मामलों में कानून को अपना काम करना चाहिए।’ उन्होंने यह भी कहा कि सभी भारतीयों का DNA एक है, चाहे वो किसी भी धर्म का हो।

भागवत का संघ के भीतर ही विरोध
करीब 50 साल बाद शायद ऐसे हालात फिर से बनते दिख रहे हैं जब संघ प्रमुख के विचार को लेकर संघ के भीतर ही आवाजें उठने लगी हैं। सूत्रों के मुताबिक विरोध के स्वर खास तौर से नागपुर, असम और पश्चिम बंगाल से आए हैं। असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों में संघ ने बहुत काम किया था। असम में तो मुस्लिम बहुल इलाकों में हर बूथ पर 20-20 लोगों की कमेटी बनाई गई, लेकिन वहां हर बूथ पर 5 से ज्यादा वोट नहीं मिले। बंगाल में भी तमाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी की ही जीत हुई।मुस्लिमों का मकसद धर्मांतरण: गोलवलकर
संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर ने लिखा था कि भारत का पिछले 1200 साल का इतिहास धार्मिक युद्ध का इतिहास रहा है, जिसमें हिंदुओं को खत्म करने की कोशिश की गई। गोलवलकर मानते थे कि 1200 साल पहले जब से मुस्लिमों ने इस धरती पर कदम रखा है, उनका एकमात्र मकसद पूरे देश का धर्मांतरण करना और उसे अपना गुलाम बनाना रहा है। संघ ने बाद में बंच ऑफ थॉट्स में गुरुजी के इन विचारों को खारिज कर दिया।मुसलमानों पर RSS में हमेशा मतभेद रहे संघ विचारक दिलीप देवधर कहते हैं, ‘संघ प्रमख डॉ. भागवत का बयान डॉ. हेडगेवार और देवरस के विचार को आगे बढ़ाने वाला है। विश्वास है कि उन्हें इसमें कामयाबी मिलेगी। गुरुजी गोलवलकर की सोच कुछ अलग रही थी। संघ का इतिहास देखें तो हिंदुत्व को लेकर RSS में हमेशा से ही मतभेद बने रहे हैं। डॉ. हेडगेवार कहते थे कि हिंदुस्तान में रहने वाला हिंदू है। जैसे अमेरिका में अमेरिकन, जर्मनी में जर्मन होता है। वे हिंदू शब्द से आसक्ति तो नहीं रखते थे, लेकिन दस हजार साल पुरानी हिंदू परंपरा और विचार के साथ चलते थे।’

सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास
देवरस के बाद संघ प्रमुख केएस सुदर्शन के नेतृत्व में साल 2002 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की शुरुआत हुई, इसके मार्ग निर्देशक इन्द्रेश कुमार हैं, लेकिन संघ खुद को इससे थोड़ा दूर ही रखता है। यहां मुसलमानों को साथ लेने की कोशिश हो रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 का चुनाव जीतने के बाद बीजेपी संसदीय दल की पहली बैठक में कहा था कि सबका साथ-सबका विकास के साथ सबका विश्वास जीतना भी जरूरी है। यह अलग बात है कि बीजेपी सरकारों में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व आटे में नमक जितना भी नहीं है। संघ विरोधियों का कहना है- मुसलमानों पर RSS की बात हाथी के दांत जैसी है यानी खाने के और, दिखाने के और.. तो फिर भागवत किस कांस्टीट्यूएंसी की तरफ देख रहे हैं।

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