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घर-घर व मंदिरों में हुआ भगवान श्रीरामजी का पूजन व आरती सभी ने की ागवान से महामारी को दूर करने की प्रार्थना, की मंगलकामना


जयपुर टाइम्स
अलवर(निसं.)। जिलेभर में बुधवार को रामनवमी का पर्व धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। कोरोना की महामारी की दूसरी लहर के चलते यह उत्सव घर-घर व मंदिरों में सरकार की गाइडलाइन की पालना करते हुए भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव मनाया गया। इस मौके पर अनेक धार्मिक आयोजन हुए। भगवान के भजनों के साथ प्रसाद वितरित किया गया। अलवर। श्री राजर्षि अभय समाज मंदिर भर्तृहरिधाम में बुधवार को श्रीराम जी का जन्मोत्सव का आयोजन हुआ। समाज के महामंत्री महेश चन्द शर्मा ने बताया कि जन्मोत्सव के दौरान मंदिर में श्रीराम दरबार, शिव परिवार, योगीराज भर्तृहरि बाबा, हनुमानजी सहित अन्य देवी-देवताओं अभिषेक  किया गया। इसके बाद उनका विशेष श्रृंगार किया गया। इसके बाद भगवान के  नाम का गुणगान हुआ। श्रीरामजी के अवतरण मंगलवेला में महाआरती की  गइत्र्न । इसके साथ भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया गया। कोविड-19 प्रोटोकॉल की पालना सुनिश्चित करते हुए प्रन्यास मंदिर श्री महादेव जी महाराज त्रिपोलिया अलवर में रामनवमी पर बुधवार को भगवान रामजी का अभिषेक व पूजन कार्यक्रम किया गया। मंदिर महंत जितेंद्र खेड़ापति ने बताया कि सर्वप्रथम प्रात: भगवान श्रीराम, मां जानकी का पंचामृत से  अभिषेक कर भगवान को नई पोशाक धारण कराई गई। पूजन कर आरती की गई। इसके बाद सभी जिले वासियों के लिए भगवान से महामारी को दूर करने की प्रार्थना कर सबके लिए मंगल कामना की गई। प्रन्यास मंदिर श्री महादेव जी महाराज त्रिपोलिया अलवर में 12 अप्रैल 2021 से आमजन प्रवेश पर प्रतिबंध किया हुआ है। जिसके चलते प्रत्येक वर्ष होने वाले भव्य आयोजनो को ना करते हुए मंदिर प्रबंधन द्वारा भगवान रामजी का पूजन अभिषेक किया गया। उधर, शहर के मनुमार्ग स्थित श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर में भी श्रीरामजी का जन्मोत्सव पर भजन हुए ओर आरती कर प्रसाद वितरित किया गया। पंडित राजेन्द्र शर्मा ने बताया कि मंदिर में पहले भगवान का अभिषेक किया गया। इसके बाद भगवान को नई पौशाक पहनाई गई। महिलाओं ने भजन गाए। प्रसाद का भोग लगाकर भक्तों को वितरित किया गया। इसके अलावा अन्य मंदिरों व घरों में भी ागवान श्रीराम जी का पूजन व आरती की गई।

महिला ईकाई की गणगौर माता की पूजा अर्चना


चूरू(निसं.)। भारत विकास परिषद चूरू की महिला इकाई द्वारा मंजू पारीक के नेतृत्व में गणगौर का बनौरा व पूजन किया गया। मंजू पारीक ने कहा कि इस  दिन माता पार्वती ने भगवान शंकर से सौभाग्यवती रहने का वरदान प्राप्त किया था तथा पार्वती ने अन्य स्त्रियों को सौभाग्यवती रहने का वरदान दिया कि इस दिन महिलाएं अपने पति से छुपकर व्रत करती हैं । और गणगौर माता यानी माता पार्वती की पूजा करके अपने पति की लंबी उम्र के लिए कामना करती हैं। सभी ने माता पार्वती को प्रसन्न करने हेतु अनेको गीत गाये तथा घुघरी का भोग लगाया। इस अवसर पर परिसद की श्रीमती मधुबाला, विजयलक्ष्मी पारीक ,कुसुम चोटिया, मंजू लधानिया, विनिता मंगल, लवली चैधरी, प्रीति, सलोनी, मनीषा आस्था,डॉ गरिमा, निहारिका, प्रियंका गुप्ता, मीनू  आदि महिलाये उपस्थित थी।
 

कोरोना गाइड लाइन के चलते नहीं भरा गणगौर मेला,टाउन हॉल में हुई गौर व ईशर की पूजा-अर्चना

रतनगढ़-कोरोना गाइड लाइन के चलते नगरपालिका द्वारा निकाली जाने वाली गणगौर की शाही सवारी नहीं निकली, लेकिन पालिकाध्यक्ष अर्चना सारस्वत ने गुरुवार की शाम टाउन हॉल में ईशर व गणगौर की पूजा-अर्चना की तथा श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ लगभग तीन घंटे तक ईशर व गणगौर टाउन में रहे। इस दौरान शहर के विभिन्न वार्डों से काफी संख्या में महिलाएं भी टाउन हॉल पहुंची तथा ईशर व गणगौर की पूजा-अर्चना कर मन्नौतियां मांगी। पूजा-अर्चना के दौरान सोशियल डिस्टेंस व मास्क का विशेष ध्यान रखा गया। शहर में गणगौर की सवारी नहीं निकलने के कारण युवतियां व नवविवाहिताएं पूजा-अर्चना के लिए टाउन हॉल पहुंची। वहीं अधिकांश महिलाओं ने अपने घरों में ही पूजा-अर्चना की। पालिकाध्यक्ष द्वारा की गई पूजा-अर्चना के अवसर पर पालिकाध्यक्ष प्रतिनिधि हेमंत सारस्वत, पार्षद पुरूषोत्तम इंदौरिया, नंदकिशोर भार्गव, प्रहलाद भार्गव, राजेश गहलोत, निखिल इंदौरिया, नेमीचंद, दिनेश प्रजापत, रामगोपाल चौधरी, शंभु लाटा, खिराज, अनिता महर्षि, मुखत्यार खान, फारूक सहित कई लोग उपस्थित थे।

गांव बालरासर आथूना में पंच कुण्डीय गायत्री महायज्ञ सम्पन्न


जयपुर टाइम्स
चूरू(निसं.)। शांतिकुंज हरिद्वार के  तत्वावधान में  आज 5 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ गायत्री शक्तिपीठ चूरू शाखा के कार्यकर्ताओं द्वारा श्रीभंवर लाल जी कड़वासरा के मुख्य यजमान एवम सरपंच  श्योराण सिंह कड़वासरा के सानिध्य में गांव की गौ शाला में आयोजित हुआ राम सिंह राठौड़ वरिष्ठ प्रतिनिधि शांतिकुंज  ने यज्ञ सम्पन्न करवाया।यज्ञ के महत्व को बताते हुए गौ सेवा पर बल दिया। राठौड़ ने कहा यदि हम घर घर मे एक एक गाय का भी पालन करें तो बहुत बड़ी राष्ट्र सेवा की जा सकती है,एवम गायें जिनकी दुर्गति हो रही है उनकी रक्षा भी हो सकती है।आज के इस यज्ञ का उद्देश्य गायों के लिये आर्थिक सहायता करना था ।गांव के काफी लोगों ने आर्थिक सहायता दे कर गौ शाला को सशक्त बनाया।आज के इस शानदार कार्यक्रम में सैंकड़ो महिलाओं व पुरूषों ने भाग लिया व सोसल डिस्टेन्स का पालन करते हुए यज्ञ में आहुतियां दी।गायत्री परिवार के पृथ्वीराज सैनी ,मनोज आर्य,गायत्री गौरशिया, कमलेश कँवर, किशन कँवर आदि ने अयोजकीय भूमिका निभाई।गांव के भाग लेने वालों में मुख्यत: हरफूला राम सैनी,शीशपाल दास, जेसराज सैनी, चंद्रा राम, लालू राम,गजानंद जांगिड़, लिखमी चंद न्यौल, नानक राम न्यौल, हनुमाना राम कड़वासरा हरचंद जाखड़,जेठा राम मदन लाल गिरधारी कड़वासरा आदि ने भाग लिया एवम सभी को कुम्भ  गंगाजल दे कर इसका महत्व समझाया व देव स्थापना चित्र दिया।अंत मे श्री श्री 108 श्रीसुवा नाथ जी महाराज ने सभी आगंतुकों को आशीर्वाद दिया। ग्रामवासी बहुत प्रसन्न हुये व भविष्य में ऐसे  आयोजन करवाने का आग्रह किया।

फागोत्सव के तहत बाबा श्याम की निकाली शोभायात्रा, भक्तों ने लगाए श्याम बाबा के जयकारें


सरदारशहर(निसं.)। शहर के आथुणा बास स्थित श्याम मंदिर से फागोत्सव के तहत बाबा श्याम की शोभायात्रा गाजे बाजे के साथ निकाली गई।  श्याम मंदिर से शोभायात्रा घंटाघर, गांधी चौक होते हुए श्याम खेजड़ी पहुंची। जहां पर श्याम भक्तों ने बाबा को निशान चढ़ाकर बाबा के धोक लगाकर सुख समृद्धि की कामना की। शोभायात्रा का बाजार में जगह-जगह पुष्प वर्षा कर व्यापारियों ने भव्य स्वागत किया। शोभायात्रा में श्याम भक्त नाचते गाते हाथों में बाबा श्याम के निशान लेकर भक्ति में लीन होकर बाबा के गुणगान करते हुए चल रहे थे। मंदिर के पुजारी श्यामलाल शर्मा ने बताया की फागोत्सव के तहत श्याम मंदिर में पहले दिन बाबा श्याम के गुणगान के तहत भजन कीर्तन का आयोजन किया गया। आज हर साल की भांति इस साल भी सरकार की कोरोना गाइडलाइन के तहत बाबा श्याम की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। जिसमें शहर के अनेक गणमान्य लोगों एवं महिलाओं ने भाग लेकर बाबा श्याम के घोक लगाकर मनौतियां मांगी।
 

एकादशी पर भक्तों को दर्शन देने नगर भ्रमण निकले लखदातार बाबा श्याम, श्रद्धा की बहती बयार, सिर पर केसरिया पगड़ी पहनकर बनडे से बने बाबा श्याम भक्तो के हृदय मे एक ही लक्ष्य, एक ही भरोसा, एक ही आशा व उम्मीद बाबा श्याम


जयपुर टाइम्स
सीकर(निसं.)। श्रद्धा की बहती बयार, रंग गुलाल उडाता भक्तों का रैला, आसमान से होती पुष्प वर्षा और हीरे-मोतियों जड़ी रंग-बिरंगी पोशाक, सिर पर केसरिया पगड़ी पहनकर बनडे से बने बाबा श्याम रथ पर सवार होकर जब खाटू की गलियों से गुजरे तो हर एक श्याम भक्त पलक पावडे बिछाए हुए उनके स्वागत में तैयार खडा रहा। एकादशी को खाटू नगरी के भ्रमण के लिए निकलें। श्याम मंदिर से सुबह सवा ग्यारह बजे रथ पर सवार बाबा श्याम की शोभायात्रा गाजे बाजे के साथ निकाली गई। शोभायात्रा के आगे सैकडों श्याम भक्त रंग गुलाल उडाते नाचते हुए चल रहे थे। पूरा खाटूधाम बाबा श्याम के जयकारों से गंजायमान हो गया था। रथ यात्रा के दौरान श्याम भक्तों की भारी भीड लग गई। भीड इतनी की खाटू की गलियां भी छोटी नजर आने लगी। इस दौरान भीड को नियंत्रित करने के लिए पुलिस व स्वयंसेवकों के पशीने छूट गए। शोभायात्रा श्याम मंदिर से श्याम कुण्ड, अस्पताल चौराहा, होटल श्याम, पुराना बस स्टेण्ड होते हुए कबुतरिया चौंक पहुंची। मीरा की करुणा.. सूर का समर्पण...चैतन्य की तन्मयता.. तुलसी की भक्ति और द्रोपदी की पुकार..। क्या नहीं है इस दृश्य में..? घर व सारे वैभव भूलकर श्याम भक्त बरामदों व चौबारों में रात गुजार रहे हैं। पैदल, पेट पलावन, दंडवत तो कोई घुटनों के बल मीलों की यात्रा करके आया है। लेकिन, ना कोई पीड़ा है ना ही चेहरे पर कोई शिकन। भूख- प्यास की भी चिंता नहीं है। बस भावों से भरे ह्रदय में नाम एक है, लक्ष्य एक है, भरोसा एक है, आशा व उम्मीद एक है..बाबा श्याम। जिनकी एक झलक की ललक लिए सैंकड़ों श्रद्धालु पूरी रात यूं ही खुले में गुजार रहे हैं। कोरोना गाइडलाइन की वजह से रात को मंदिर के पट व धर्मशालाओं के दरवाजे बंद होना भी इनकी आस्था के सामने बिल्कुल नहीं अखरता। श्याम नाम का जप व स्मरण तो कोई भजन- कीर्तन से श्याम दर्शनों के बीच आई रात को भक्ति भाव से रोशन कर रहा है। तन थकान से चूर है, लेकिन मन में नई नई उमंग उठती है। ज्यों- ज्यों रात ढलती हैं, श्याम मिलन की आस में उत्साह त्यों- त्यों बढ़ता जाता है। बाबा के पट खुलने पर तो आस्था ह्रदय के रास्ते रोम- रोम तक पहुंचकर पूरे तन को रोमांच से भर देती है। भावों से मन इतना विह्वल हो जाता है कि कई प्रेमी भक्तों की आंखें ही निर्झर हो जाती है। खाटूश्यामजी मेले का मुख्य मेला एकादशी पर गुरुवार को आयोजित हुआ। जिसमें बाबा श्याम के दर्शनों के लिए लाखों भक्तों पहुंचे । श्याम सरकार के दर्शनों के लिए रात तक 65 हजार श्रद्धालु पंजीयन करवा चुके थे।

 देर रात के पंजीयन व स्थानीय लोगों को शामिल करने पर श्रद्धालुओं की संख्या लाखों से ज्यादा रही। मुख्य मेले में खास बात इस बार बाबा श्याम के रात को दर्शन नहीं होना भी रहेगा। कोरोना गाइडलाइन के चलते एकादशी पर भी श्याम मंदिर के पट रात 10 बजे बंद हो जाएंगे। जो अगले दिन सुबह पांच बजे ही खुलेंगे। यानी हर बार लगातार 72 घंटे लगातार दर्शन देने वाले बाबा श्याम के एकादशी पर भी पूरे दिन दर्शन नहीं दे पाएंगे।


नीले घोड़े पर सवार होकर आए बाबा श्याम

श्याम एकादशी पर श्याम बाबा की शोभायात्रा सफेद घोड़ों के रथ पर निकाली गई। जिसमें बाबा श्याम नीले घोड़े पर सवार होकर अपने भक्तों को दर्शन दिए। बाबा श्याम की शाही सवारी दोपहर एक बजे मंदिर परिसर से रवाना होकर श्याम कुंड, शनि मंदिर, जांगिड़ मोहल्ला, अस्पताल चौराहा, पुराना बस स्टेंड होते हुए शोभायात्रा कबुतरियां चौक पर पहुंची।

भगवान को लगाया गया छप्पन भोग

एकादशी पर बाबा श्याम को छप्पन भोग लगाया गया। श्री श्याम मंदिर कमेटी के मंत्री श्याम सिंह चौहान ने बताया कि एकादशी के दिन बाबा श्याम के विशेष श्रृंगार के साथ 56 मिष्ठानों का भोग लगाया गया। 56 भोग तैयार करने के लिए कारीगर राजस्थान से बाहर से बुलाए गए है। कारीगर बाबा के छप्पन भोग के लिए पिछले तीन दिन से तैयारी में जुटे थे।


रात को दर्शन नहीं देंगे श्याम सरकार

 बाबा श्याम के फाल्गुनी लक्खी मेले में पहली बार एकादशी की रात को बाबा श्याम के दर्शन श्रद्धालुओं को नहीं होंगे। कोरोना गाइडलाइन के चलते एकादशी पर भी रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक श्याम मंदिर के पट बंद ही रहेंगे। जिसके चलते श्याम भक्तों में खासी निराशा भी है।

नए साल पर श्रद्धालू कर रहे हैं बालाजी के दर्शन हरियाणा पंजाब से पहुंच रहे हैं श्रद्धालु

जयपुर टाइम्स
सालासर (  बाबूलाल राव)। बालाजी मंदिर में नए वर्ष को लेकर मेला परवान पर कोरोनावायरस कारण श्रद्धालुओं को ऑनलाइन बुकिंग कर दर्शन कर रहे हैं नागरमल पुजारी ने बताया कि सालासर बालाजी मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर 50 पुलिस के जवान तैनात किए गए हैं जो श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए हैं जिससे सोशल डिस्टेंसिंग पूरा ख्याल रखते हैं नागरमल पुजारी ने बताया कि हर वर्ष से इस वर्ष मेला बहुत कमजोर है और बहुत ही कम श्रद्धालु सालासर पहुंच रहे हैं मेले में मेले के प्राइवेट बाउंसर भी है और रात्रि में धर्मशाला में जो लगने वाले जागरण वह अनेक धार्मिक कार्यक्रम है उन पर भी पुलिस प्रशासन ने पूरी तरीके से बैन कर रखा है किसी भी तरह की भीड़ नहीं हो इसके लिए पुलिस चप्पे-चप्पे पर तैनात हैसिद्धपीठ श्री मोहनदासजी महाराज की असीम भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं रामदूत श्री हनुमानजी ने मूर्ति रूप में संवत् 1811 विक्रमी श्रवण शुक्ला नवमी शनिवार को आसोटा में प्रकट होकर सालासर में अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण की। सम्वत् 1815 में अपने शिष्य उदयराम जी द्वारा मंदिर बनाकर उदयरामजी व उनके वंशजों को मंदिर की सेवा सौंपकर आप जीवित समाधिस्थ हो गये।

सालासर। राजस्थान प्रान्त के चूरू जिला की सुजानगढ़ तहसील की पूर्वी सरहद पर स्थित एक छोटा सा कस्बा है। तात्कालिक समय में ग्राम सालासर बीकानेर राज्य के अन्तर्गत था। जहाँ पं. सुखरामजी निवास करते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम 'कान्ही बाईÓ था जो जयपुर रियासत में ठिकाना सीकर वर्तमान में जिला सीकर के ग्राम रूल्याणी के पं. लच्छीरामजी की पुत्री थी जो 6 भाईयों में इकलौती बहिन थी। पं. सुखराम जी व कान्हीबाई से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम उदयराम था। उदयराम की उम्र 5 वर्ष हुई तब पं. सुखराम जी का स्वर्गवास हो गया। पं. सुखरामजी भगवत भजन के अतिरिक्त जीविकोपार्जन हेतु कृषि करते थे। पति का निधन हो जाने के कारण अकेली कान्हीबाई पुत्र उदयराम के उचित पालन पोषण में सहयोग हेतु अपने पीहर ग्राम रूल्याणी में पं. पिता लच्छीरामजी के पास रहने चली गई। काफी समय बीतने के पश्चात् कान्हीबाई ने अपने घर व कृषि संभालने हेतु सालासर आने का निर्णय किया। पं. लच्छीरामजी ने पुत्री के इस दु:खद समय में सहयोग हेतु अपने पुत्रों में से किसी एक को कान्हीबाई के पास सालासर रहने को कहा। पं. लच्छीरामजी की संतान में सबसे छोटे पुत्र मोहन अविवाहित थे अत: गृहस्थ संबंधी जिम्मेदारी से मुक्त होने के कारण मदद हेतु अपनी बहिन के साथ सालासर आ गये। पं. लच्छीरामजी एवं पं. सुखरामजी का परिवार धर्मपरायण व भगवतानुरागी होने के कारण मोहन को सालासर में अपनी बहिन के घर भगवत-भजन का समुचित वातावरण मिल गया। दोनों ही परिवारों के आराध्य अंजनीसुत हनुमान थे। मोहन तो बाल्य अवस्था से ही श्री हनुमानजी महाराज के अनन्य भक्त थे और वही वातावरण उन्हं बहिन के घर प्राप्त हो गया। घर पर शांत वातावरण के साथ-साथ एकान्त समय मिल जाने से मोहन अत्यधिक भक्तिरत रहने लगे। ज्यों-ज्यों समय बीतता गया त्यों-त्यों मोहन को गृहस्थ के सभी कार्यों से विरक्ति उत्पन्न होती गई तथा हनुमानजी की भक्ति में लीन रहने लगे। एक दिन उदयराम के साथ खेत में कृषि कार्य करते समय मोहन के हाथ से बार-बार गण्डासी फेंके जाने का क्रम देखकर उदयराम ने निवेदन पूर्वक कहा, 'मामा आपकी तबियत ठीक नहीं है तो आप थोड़ी देर के लिए लेटकर विश्राम कर लेंÓ। मोहन ने उदयराम से कहा, 'कोई अलौकिक शक्ति मेरे हाथ से गण्डासी छीन कर फेंक रही है तथा मुझे यह आभास करा रही है कि तू इस सांसारिक मोह चक्र में किस लिए फंस रहा है?Ó  उदयराम इस घटना को समझ नहीं सके तथा सारा वृतान्त माँ को बताया कान्ही बाई ने सोचा मोहन कहीं विरक्त न हो जाय अत: शीघ्रतिशीघ्र विवाह बंधन में बांध देना ही श्रेयकर है। यह सोचकर बहिन कान्ही बाई ने तुरन्त मोहन के विवाह हेतु गहने, वस्त्र आदि के लिए सस्ते में अनाज विक्रय कर समस्त आवश्यक संसाधन जुटा लिए। कान्हीबाई ने मोहन की सगाई कर दी। बीजा नामक नाई को लड़की के घर शगुन देकर भेजा जा रहा था तब मोहन ने कहा इसका जाना व्यर्थ है क्योंकि उस लड़की की मृत्यू हो गई है। कान्हीबाई ने मोहन को टोकते हुए समझाने की कोशिश की कि शुभ अवसर पर अपशगुन युक्त बात नहीं बोलते। इस पर मोहन ने कहा, ' इस संसार में मेरे लिए जो बड़ी है वह माँ है, हम उम्र है वह बहिन है, छोटी है वह बेटी है। फिर विवाह किससे करूं? बहिन कान्हीबाई को इसी बात का डर था कि वह विरक्त हो जायेगा। नाई सगुन लेकर लड़की के घर पहुँचा तो उसकी अर्थी निकल रही थी। वापस आकर सारी वार्ता कान्हीबाई को बता दी गई। उपरोक्त घटना के पश्चात् सन्यास ग्रहण कर मोहन से मोहनदास बन गये। हनुमद् भजन में इतने तल्लीन हो गये कि न खाने-पीने की सुध रही और न तन की सुध रही। जंगल में कई दिनों तक समाधिस्थ हो जाते। उदयराम गांव वालों की मदद से खोजते, फिर रेत हटाकर उन्हें समाधि से जगाते, मुँह हाथ धुलाकर पानी पिलाते। अनुनय विनय कर घर लेकर आते तथा भोजन करवाते। यही उनके जीवन का क्रम बन गया। उन्हें हनुमत प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य कोई सुध नहीं थी। हनुमत कृपा से परमहंस बन गये तथा उनकी वाणी सिद्ध हो गई। भानजा उदयराम ने घर से थोड़ी दूर स्थित अपनी कृषि भूमि महात्मा मोहनदासजी के सुपुर्द कर, उसमें मोहनदासजी को तपस्या हेतु धुणी तथा राम हनुमान कुटिया बनवा दी। जिसे मोहनदासजी ने अपनी तपस्या स्थली बनाकर अपने आराध्य की साधना करने लगे। एक दिन मोहनदासजी ही कान्हीबाई के पास बैठ भोजन कर रहे थे कि घर के बाहर से भिक्षा के लिए 'अलखÓ की आवाज आई। मोहनदासजी ने बहिन कान्ही बाई से कहा कोई सन्त भिक्षार्थ आये है, उन्हें भिक्षा दो। जब कान्ही बाई भिक्षा लेकर बाहर आई तो वहां कोई दिखाई नहीं दिया। छोटा सा गांव था। स्वयं मोहनदासजी ने दूर-दूर तक देखा पर न पदचिन्ह् नजर आये न ही कोई दृष्टिगत हुआ। तब मोहनदासजी ने कान्हीबाई से कहा, 'स्वयं हनुमान प्रभू थे। मैं दर्शन से चूक गया।Ó ठीक दो माह उसी समय पुन: अलख की आवाज आई, कान्हीबाई ने आवाज पहचान ली और मोहनदासजी से कहा तू जो कह रहा था, वहीं हनुमान साधु फिर आया है यह आवाज उसकी ही है। भक्त प्रवर हनुमानजी साधु वेश में थे जिनके मुख मंडल पर दाड़ी और मूँछ तथा हाथ में सोटा। अपने भक्त मोहनदास को दर्शन देने स्वयं उनके घर आये फिर भी मोहनदास के प्रति इतना वात्सल्य भाव था कि उन्हें आते देखकर तेज गति से वापिस जाने लगे। मोहनदासजी दौड़ते हुये अनके पीछे हो लिए तब दूर जंगल में जाकर रूके तथा सोटा उठाकर मोहन को धमकाते हुए कहा मेरी गैल छोड़, बोल तुझे क्या चाहिए? जो मांगना है मांग, तुझे प्रसन्नता से दूंगा। यह सब हनुमान प्रभु की लीला थी जिसे मोहनदासजी अच्छी तरह पहचान रहे थे। मोहनदासजी सुना अनसुना कर प्रभु के पैरों से लिपट गये और उन्होंने महावीर के पैर कसकर पकड़ लिये। मोहनदासजी ने चरणाविंद में पड़े-पड़े आर्तनाद करते हुए कहा 'मैं जो चाहता था वो मिल गया इसके सिवा कुछ नहीं चाहिये। यदि आप वापिस घर चले तो ही मुझे विश्वास होगा कि आप मुझ पर प्रसन्न है।Ó परम प्रभु हनुमान तो मोहनदासजी की अनन्य भक्ति के वशीभूत हो चुके थे भक्त की भावना के सम्मान हेतु यह सब कर रहे थे अत: बजरंग बली ने मोहन से कहा मैं तुम्हारे साथ तब ही चल सकता हूँ यदि तुम खाण्ड युक्त खीर का भोजन करवा सको तथा अछूती शैया पर विश्राम करवा सको। बात तो केवल घर चलने की थी, पर अपने भक्त को सानिध्य देने हेतु स्वयं ही भोजन व विश्राम की शर्त रख दी। श्री हनुमानजी मोहनदास के साथ घर आये। इस तरह मोहनदास अपने आराध्य के प्रति इतने समर्पित हो गये कि एक घड़ी भी वे हनुमत प्रभु से विलग नहीं रहना चाहते थे। बार-बार हनुमानजी को साक्षात्कार करने के लिए आना पड़ रहा था। मोहनदास ने हनुमत प्रभु से प्रार्थना की कि आप को बार-बार आना पड़ता है मैं आपके दर्शन बिना नहीं रह सकता। आप बस इतनी प्रार्थना स्वीकार करें कि आप पलभर भी मुझ से दूर नहीं होंगे। श्री हनुमान प्रभु ने भक्त की प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा, ''तथास्तु। मैं स्वयं मूर्ति स्वरूप तेरे पास सालासर रहूँगा। यह वरदान देता हूँ।ÓÓ इस वरदान प्राप्ति के बाद मोहनदासजी हनुमत प्रतिमा की दिन रात प्रतिक्षा लगे। एक दिन आसोटा ग्राम के जागीरदार का मोहनदासजी के दर्शनार्थ आगमन हुआ। उन्होंने महात्मा से सेवा हेतु निवेदन करने पर मोहनदासजी ने कहा आपके यहाँ मूर्तिकार है? मुझे हनुमान महाप्रभु की मूर्ति बनवाकर भिजवायें। ठाकुर ने अहोभाग्य मानकर मूर्ति अतिशीघ्र भिजवाने का विश्वास दिया। आसोटा ग्राम में एक कृषक द्वारा खेत की जुताई के दौरान उसके हल का फाल किसी वस्तु में अटक गया। कृषक ने बैलों को रोककर उस जगह की खुदाई  की जिसमें हनुमानजी की सुन्दर प्रतिमा राम-लक्ष्मण कंधों पर बैठे हुई मिली। कृषक ने श्रद्धा पूर्वक सफाई कर अपनी धर्मपत्नी से कहा देखों किनती सुन्दर मूर्ति निकली है, किसान की पत्नी भाव विभोर होकर खेजड़ी के वृक्ष के नीचे मूर्ति रखकर रोटी से बना चूरमा का भोग लगाया और ठाकुर को सूचना भेजी, ठाकुर सम्मानपूर्वक मूर्ति घर ले आये। ठाकुर को विश्राम के समय निद्रावस्था में आवाज सुनाई दी कि मैं भक्त मोहनदास के लिए प्रकट हुआ हूँ। मुझे तुरन्त सालासर पहुँचाओं। ठाकुर को मोहनदासजी से वार्ता याद आयी। उन्होंने ग्रामवासियों को समस्त वृतान्त बताया तथा मूर्ति को बैलगाड़ी में विराजमान कर ग्रामवासियों के साथ कीर्तन करते हुए सालासर के लिए रवाना हो गये। इधर मोहनदासजी को यह सब भान हो गया वे अगवाई के लिए सालासर से रवाना हो गये मूर्ति सम्मानपूर्वक सालासर लाई गई महात्मा की धुणी के पास जाकर बैल रूके, जहाँ उसी रोज संवत् 1811 श्रावण शुक्ला नवमी शनिवार के दिन श्री बालाजी मूर्ति स्थापित करने के लिए नूर मोहम्मद व दाऊ नामक कारीगरों को बुलवाया तथा संवत् 1815 में मंदिर का निर्माण करवाया। अपने ईष्ट को साक्षात् मूर्ति के रूप में पाकर मोहनदासजी ने सेवा पूजा हेतु अपने शिष्य उदयराम को तन का चोगा पहनाकर उन्हें दीक्षा दी तत्पश्चात् चोगे को मंदिर की गद्दी के रूप में निहित कर दिया गया। श्री हनुमानजी की मूर्ति का स्वरूप दाड़ी व मूँछ युक्त कर दिया क्योंकि प्रथम दर्शन मोहनदासजी को इसी रूप में हुए थे। ज्योति प्रज्जवलित की गई जो संवत् 1811 से आज तक ज्यों कि त्यों प्रज्जवलित है। भक्त प्रवर मोहनदासजी संवत् 1850 बैशाख शुक्ला त्रयोदशी को प्रात:काल जीवित समाधी लेकर ब्रहम् लीन हो गये। पितृपक्ष में मोहनदासजी का श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध दिवस त्रयोदशी को मनाया जाता है। जो श्री बालाजी मंदिर का प्रमुख महोत्सव है जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते है। श्री बालाजी महाराज का प्रकाट्य दिवस श्रावण शुक्ला नवमी मंदिर का प्रमुख उत्सव है। इस उत्सव में हजारों श्रद्धालु जन भाग लेते है। इसके अलावा भाद्र मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'रेवाड़ी ग्यारशÓ (जलझुलनी एकादशी) के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर भी भव्य कार्यक्रम होता है जिसमें हजारों की संख्या में भीड़ होती है। प्रत्येक मंगलवार को पुजारी परिवार के द्वारा मंदिर परिसर में सुन्दकाण्ड का पाठ किया जाता है।
कोरोना काल में ये हुए बदलाव -
कोरोना काल में मंदिर के पट्ट बंद होने के कारण वर्ष में लगने वाले दो बड़े मेले, स्थापना दिवस, संत शिरोमणी मोहनदास महाराज का श्राद्ध, झलझुलणी एकादशी पर होने वाले कार्यक्रमों का आयोजन नही किया गया। इनके अलावा कोरोना काल के बाद मंदिर खुलने पर आने वाले श्रद्धालुओं पहले की बजाए अब कई बदलाव के साथ बालाजी महाराज के दर्शन करने पड़ते है। अब यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रतिदिन लाइव आरती का प्रसारण किया जाता है। इनके अलावा आने वाले श्रद्धालुओं को पहले ही सालासर टोकन एप के माध्यम से पहले ही रजिस्ट्रेशन भी करवाना होता है। इनके अलावा मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही मास्क लगाना, हाथों को सेनेटाइजर से धोना पड़ता है। इनके अलावा श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए प्रवेश द्वार पर ही फेस रीडर कैमरा भी लगाया गया है इनके अलावा चैम्प्रेचर मापकर ही मंदिर में प्रवेश करवाया जाता है। बालाजी महाराज की मूर्ति और श्रद्धालुओं के बीच एक पारदर्शी काच लगाया हुआ जिसके सामने से ही श्रद्धालु को दर्शन करके लौटना पड़ता है। पहले की तरह परिक्रमा लगाना बंद है।

घोटेवाले बालाजी मंदिर में अनुकूट महोत्सव धूमधाम से मनाया

चौंमू। शहर के सामोद रोड घाटावाल कृषि फार्म में स्थित घोटे वाले बालाजी मंदिर परिसर में अनुकूट महोत्सव बड़े ही धूमधाम से आयोजन किया गया। इससे पूर्व मंदिर परिसर को रंग बिरंगी रोशनी से सजाया गया। अनुकूट महोत्सव में कलाकारों ने विभिन्न भजनों की प्रस्तुतियां देकर श्रोताओं का मन मोह लिया। साथ ही सुंदरकांड का पाठ भी किया गया। मंदिर परिसर में दूरदराज से आए हुए भक्तों ने भोजन प्रसादी ग्रहण की। कोविड-19 महामारी को देखते हुए सभी लोगों ने मास्क लगाकर सरकार द्वारा दी गई एडवाइजरी की पालना की। इस मौके पर हनुमान सहाय घाटावाल, भगवान सहाय, गंगाराम, राधेश्याम, पूर्व चेयरमैन गोविंद नारायण सैनी, शैतान मीणा, रामपाल मीणा आदि लोग उपस्थित थे।
 

हर्षोल्लास से मनेगी भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन की जयंती

तीन दिन चलेंगे अनेक कार्यक्रम, बैठक में लिया निर्णय
जयपुर टाइम्स
अलवर(निसं.)। श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन सेवा समिति की बैठक बुधवार को बाल विहार स्कूल परिसर स्थित श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन मंदिर में हुई । जिसमें भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन की जयंती मनाए जाने का निर्णय किया गया।
राष्ट्रीय युवा प्रवक्ता जितेन्द्र गोपालिया ने बताया कि भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन जयंती 20 नव बर से 22 नव बर तक तीन दिवसीय मनाई जाएगी। जिसमें 20 नव बर को भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन की पूजा-अर्चना व अभिषेक तथा ध्वजारोहण होगा। वहीं इसके बाद सवा नौ बजे श्रीरामचरित मानस के  पाठ का शुभार भ होगा ओर उसके बाद सवा ग्यारह बजे भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन को भोग लगाकर शहर के तीनों चिकित्सालय राजकीय महिला, शिशु व राजीव गांधी सामान्य चिकित्सालय में फल वितरण किया जाएगा। उन्होंने बताया कि 21 नव बर को भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन की प्रतिमा का विशेष  श्रृंगार व पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद श्रीरामचरित मानस के पाठ का समापन के साथ यज्ञ-हवन होगा। वहीं सवा ग्यारह बजे आरती तथा सवा 12 बजे प्रसाद वितरित किया जाएगा। इसके साथ ही 22 नव बर को सुबह दस बजे अन्नकूट महोत्सव होगा। जिसमें कोविड-19 के दिशा-निर्देशों की पालना करते हुए पंगत प्रसादी बांटी जाएगी। बैठक में सोमवंशी समाज के वरिष्ठजनों ने भाग लिया। जिसमें सभाअध्यक्ष ओमप्रकाश सोमवंशी, शिक्षा समिति के अध्यक्ष मदनसिंह हाडा, राजेश जायसवाल, योगेश, संरक्षक श्याम सिंह, सुनील गोपालिया, ललित धानावत, वेदप्रकाश बेनीवाल, जितेन्द्र गोपालिया, बृजेश सोमवंशी, प्रतीक साईवाल, खेमेन्द्र सोमवंशी, मनीष गोपालिया, मयंक गोपालिया आदि मौजूद रहे।  

कराची के जिन्ना मार्ग पर 800 हिंदुओं ने गणेश उत्सव मनाया, लोगों ने कहा- डेढ़ दिन की पूजा से सालभर की ऊर्जा मिली

कराची के रत्नेश्वर महादेव मंदिर, गणेश मठ मंदिर और स्वामीनारायण मंदिर में यह उत्सव होता है
गणेश उत्सव की शुरुआत कृष्णा नाईक ने आज से 76 साल पहले की थी, वे बंटवारे के बाद कराची जाकर बस गए थे
जयपुर टाइम्स
कराची(एजेंसी)। मंदिर मे बड़ा पंडाल, शंखनाद करते भक्त, लाल चूडिय़ां और पारंपरिक पोशाक पहने महिलांए 'जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ती' की आरती गाते दिखाई दें तो यह अपने लिए आम बात हो सकती है। अगर यह नजारा पाकिस्तान के कराची शहर का हो तो आपको शायद पहले विश्वास न हो। यहां रहने वाले 800 से ज्यादा भारतीय मूल के महाराष्ट्रियन परिवार सालों से गणपति उत्सव मनाते आ रहे हैं। इन्होंने कराची के बड़ा मंदिर में डेढ़ दिन का गणेश उत्सव मनाया। इनका कहना था कि इससे पूरे साल की ऊर्जा मिल गई। कराची के रत्नेश्वर महादेव मंदिर, गणेश मठ मंदिर और स्वामीनारायण मंदिर में यह उत्सव होता है। गणेश उत्सव की शुरुआत कृष्णा नाईक ने आज से 76 साल पहले की थी। वे बंटवारे के बाद कराची जाकर बस गए थे। कृष्णा के बाद उनके बेटे राजेश नाईक और अब उनकी नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे निभा रही है। नाईक परिवार ने पहले कुछ लोगों के साथ मिलकर इसकी शुरूआत की थी। बाद में कराची के कई मराठी परिवारों को इससे जोड़ा। कराची में रहने वाले सोशल एक्टिविस्ट और कराची मराठी कम्युनिटी के सदस्य विशाल राजपूत ने इस साल मनाए गए गणेश उत्सव की जानकारी दैनिक भास्कर को दी। उन्होंने बताया कि कराची में महाराष्ट्रियन पंचायत की स्थापना की गई है। इसके जरिए सभी भारतीय त्योहार, उत्सव मनाए जाते हैं। अभी कराची में 800 से ज्यादा मूल कोंकणी मराठी लोग रहते हैं। विशाल राजपूत ने बताया कि कराची में भारी तादाद में हिंदू रहते हैं। 

हर साल एमए जिन्ना मार्ग से गणपति का जुलूस निकलता है, लेकिन अब तक कभी भी दो समुदायों के लोगों के बीच टकराव नहीं हुआ। भारत-पाकिस्तान में जब भी तनाव का माहौल होता है, इसका कोई असर यहां नहीं होता। यहां मुस्लिम परिवार भी इस उत्सव में शामिल होते हैं।